अद्भुत है नीलकंठ महादेव मंदिर जहां शिव ने जीता काल, यहां से बदल गया था इतिहास का रुख, आस्था, युद्ध और रहस्य का संगम

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Banda Neelkanth temple kalinjar fort history: कुछ स्थान ऐसे होते हैं जहां पत्थर भी कहानी सुनाते हैं. उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का कालिंजर किला ऐसी ही एक जगह है. इसी किले की दीवारों के सामने 16वीं सदी के उत्तर भारत के शक्तिशाली और महान शासक शेरशाह सूरी की आखिरी सांसें थम गई थीं. शेरशाह सूरी का जीवन जितना तेज और निर्णायक था, उनका अंत उतना ही अचानक और अप्रत्याशित रहा.

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कालिंजर: एक किला, दो कहानियां आस्था और सत्ता की

पटना. उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित कालिंजर किला भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण दुर्ग है. विंध्य पर्वतमाला की ऊंची पहाड़ी पर बना यह किला प्राचीन काल से ही सामरिक दृष्टि से बेहद अहम माना जाता रहा है. समुद्र तल से लगभग 1200 फीट ऊंचाई पर स्थित यह दुर्ग प्राकृतिक सुरक्षा और मजबूत दीवारों के कारण लंबे समय तक अजेय रहा. इतिहासकारों के अनुसार, कालिंजर पर प्राचीन काल में गुप्तों का प्रभाव रहा, बाद में चंदेल शासकों ने इसे अपनी शक्ति का केंद्र बनाया. 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच चंदेल राजाओं ने यहां भव्य निर्माण कराए. यही वह काल था जब किले के भीतर प्रसिद्ध नीलकंठ महादेव मंदिर का विस्तार हुआ.

शेरशाह सूरी का अंतिम अभियान

16वीं शताब्दी में उत्तर भारत के शक्तिशाली शासक शेरशाह सूरी ने अपनी साम्राज्य विस्तार नीति के तहत बुंदेलखंड की ओर रुख किया. 1545 ईस्वी में उनका लक्ष्य था कालिंजर पर अधिकार. उस समय यहां चंदेल वंश के राजा कीरत सिंह का शासन था. कई महीनों तक किले की घेराबंदी की गई. मजबूत दीवारें और ऊंचाई पर स्थित संरचना के कारण मुगल और अफगान सेनाओं के लिए इसे जीतना आसान नहीं था. ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार 22 मई 1545 को शेरशाह ने किले की दीवारें तोपों से तोड़ने का आदेश दिया. बताया जाता है कि एक आग्नेयास्त्र का गोला दीवार से टकराकर वापस बारूद के भंडार पर गिरा. भीषण विस्फोट हुआ. शेरशाह गंभीर रूप से जल गए. उसी दिन उनकी मृत्यु हो गई. हालांकि उनके सैनिकों ने बाद में किले पर अधिकार कर लिया, लेकिन यह जीत उनके लिए व्यक्तिगत हार बन गई. कालिंजर का नाम इस घटना के कारण इतिहास में और भी प्रसिद्ध हो गया.

1545 ईस्वी में उत्तर भारत के शासक शेरशाह सूरी ने इसी किले पर चढ़ाई की. घेराबंदी के दौरान हुए विस्फोट में वह गंभीर रूप से झुलस गए और उनकी मृत्यु हो गई.

इतिहास और स्थापत्य का संगम

कालिंजर किला केवल युद्ध और राजनीति का साक्षी नहीं है, बल्कि यह स्थापत्य कला का भी अद्भुत उदाहरण है. किले के भीतर कई जलकुंड, महल अवशेष और प्राचीन शिलालेख मिलते हैं. चंदेल राजाओं ने यहां जल संरक्षण की उन्नत व्यवस्था बनाई थी. वर्षा जल को संरक्षित करने के लिए विशेष कुंड और तालाब तैयार किए गए थे. महाभारत और कुछ पुराणों में भी कालिंजर को पवित्र तीर्थ के रूप में उल्लेखित किया गया है. हालांकि ऐतिहासिक प्रमाण मुख्य रूप से मध्यकालीन अभिलेखों और पुरातात्विक साक्ष्यों से मिलते हैं.

आज यह धरोहर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है. इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है. उत्तर प्रदेश सरकार इसे प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर रही है.

वर्तमान स्थिति और संरक्षण

आज कालिंजर किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया है. समय समय पर यहां मरम्मत और संरक्षण कार्य किए जाते हैं. उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इसे पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई है. सड़क, प्रकाश व्यवस्था और पर्यटक सुविधाओं को बेहतर किया जा रहा है. गणतंत्र दिवस की झांकियों और पर्यटन अभियानों में भी कालिंजर को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया है.

कालिंजर किले की पत्थर की इन दीवारों ने समय को गुजरते देखा है, और आज भी वे उसी शांति से खड़ी हैं, मानो बता रही हों कि काल से बड़ा कोई नहीं.

इतिहास का क्या संदेश?

कालिंजर किला एक अनोखा प्रतीक है. यहां एक ओर भगवान शिव की कथा जुड़ी है तो दूसरी ओर एक महान शासक की अंतिम सांसों की कहानी. शेरशाह सूरी ने प्रशासनिक सुधार और सड़क निर्माण के लिए ख्याति पाई, लेकिन उनका अंत इसी किले की घेराबंदी के दौरान हुआ. आज यह किला अतीत की उस कहानी को दोहराता है कि समय सबसे शक्तिशाली है. साम्राज्य उठते हैं और गिरते हैं, लेकिन इतिहास की इमारतें अपने भीतर कई युगों की गवाही समेटे खड़ी रहती हैं.

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Vijay jha

पत्रकारिता क्षेत्र में 22 वर्षों से कार्यरत. प्रिंट, इलेट्रॉनिक एवं डिजिटल मीडिया में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन. नेटवर्क 18, ईटीवी, मौर्य टीवी, फोकस टीवी, न्यूज वर्ल्ड इंडिया, हमार टीवी, ब्लूक्राफ्ट डिजिट…और पढ़ें



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