पूरी दुनिया में शीत युद्ध (कोल्ड वॉर) का खौफ चरम पर था. अमेरिका और सोवियत संघ एक-दूसरे की तरफ बंदूकें ताने खड़े थे. इस माहौल में अगर कोई आपसे कहे कि रूस ने अपनी घातक पनडुब्बियां और जंगी जहाज एक अमेरिकी कंपनी को सिर्फ इसलिए सौंप दिए, क्योंकि उन्हें ‘पेप्सी’ पीनी थी, तो शायद आपको यकीन नहीं होगा. लेकिन 1989 की गर्मियों में समंदर की लहरों ने एक ऐसा सौदा देखा, जिसने इतिहास के सारे कायदे बदल दिए. यह एक ऐसी कंपनी की कहानी है, जिसने व्यापार के लिए देश की सरहदों और विचारधाराओं को तोड़ दिया, और कुछ ही घंटों के लिए दुनिया की छठी सबसे बड़ी समुद्री ताकत बन गई.
किस्सा शुरू होता है 1959 से, जब मॉस्को में अमेरिकन नेशनल एग्जीबिशन (American National Exhibition) लगी थी. उस वक्त के अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन (Richard Nixon) और सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव (Nikita Khrushchev) के बीच बहस छिड़ी हुई थी. माहौल गर्म था. तभी पेप्सी के तत्कालीन प्रमुख डोनाल्ड केंडल (Donald Mcintosh Kendall) ने बीच-बचाव करते हुए ख्रुश्चेव को पेप्सी का एक गिलास थमा दिया. ख्रुश्चेव ने जब उसका घूंट भरा, तो उनके चेहरे के भाव बदल गए. उन्हें वह स्वाद इतना पसंद आया कि उन्होंने अपने पूरे देश के लिए पेप्सी का रास्ता खोल दिया.
करेंसी की जगह वोदका देकर खरीदी पेप्सी
लेकिन यहां एक बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो गई. सोवियत संघ की करेंसी रूबल थी, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोई कीमत नहीं थी. यानी सोवियत संघ पेप्सी खरीदने के लिए डॉलर में भुगतान नहीं कर सकता था. अब पेप्सी को अपना सिरप बेचना था और सोवियत संघ को उसे खरीदना था, लेकिन करेंसी की प्रॉब्लम थी.
यहीं से शुरू हुआ दुनिया का सबसे बड़ा और अनोखा बार्टर सिस्टम. पेप्सी ने पैसे के बदले सोवियत संघ से उनकी मशहूर स्टोलिचनया वोदका (Stolichnaya Vodka) लेना स्वीकार किया. सीधा सौदा था. पेप्सी रूस को अपना सिरप देगी और बदले में रूस पेप्सी को वोदका देगा. कई सालों तक यह सिलसिला ठीक तरीके से चलता रहा. अमेरिका में रूसी वोदका हिट हो गई और रूस में पेप्सी का क्रेज सातवें आसमान पर पहुंच गया.
वक्त बदला और 1980 के दशक के अंत तक रूस में पेप्सी की मांग इतनी बढ़ गई कि सिर्फ वोदका से भुगतान करना मुमकिन नहीं रहा. सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था चरमरा रही थी, लेकिन लोगों को पेप्सी की आदत लग चुकी थी. पेप्सी को अपने अरबों डॉलर के बकाया पैसे चाहिए थे, लेकिन रूस के पास देने के लिए डॉलर थे ही नहीं.
जंगी जहाज और पनडुब्बियों पर हुआ सौदा
तभी क्रेमलिन के गलियारों में एक अजीबोगरीब प्रस्ताव रखा गया. उन्होंने पेप्सी से कहा, “हमारे पास पैसा नहीं है, लेकिन हमारे पास पुराने पड़ रहे जंगी जहाज और पनडुब्बियां हैं. क्या आप इन्हें लेंगे?”
दुनिया के बिजनेस इतिहास में शायद ही कभी किसी CEO ने ऐसा फैसला लिया होगा. पेप्सी के पास विकल्प कम थे. 1989 में एक ऐतिहासिक समझौता हुआ. सोवियत संघ ने पेप्सी को भुगतान के रूप में 17 पुरानी पनडुब्बियां, एक क्रूजर (जंगी जहाज), एक फ्रिगेट और एक डिस्ट्रॉयर जहाज सौंप दिए.
अब सोचिए, एक सॉफ्ट ड्रिंक कंपनी, जिसका काम टीवी पर विज्ञापन दिखाना और बोतलें बेचना था, उसके बेड़े में अब परमाणु शक्ति संपन्न देश की घातक पनडुब्बियां शामिल हो चुकी थीं. इस सौदे के होते ही पेप्सी तकनीकी रूप से दुनिया की छठी सबसे बड़ी नौसेना बन गई थी. उस समय पेप्सी के बेड़े में भारत या कई यूरोपीय देशों से भी ज्यादा पनडुब्बियां थीं.
सबकुछ कबाड़ में बेच डाला, कमा लिया मुनाफा
पेप्सी के सीईओ डोनाल्ड केंडल ने इस पर मजाक करते हुए अमेरिकी सरकार से कहा था, “मैं आप लोगों के मुकाबले सोवियत संघ को बहुत तेजी से निहत्था कर रहा हूं.” यह बयान उस समय के तनावपूर्ण माहौल में एक कड़वा सच भी था.
लेकिन पेप्सी का इरादा युद्ध लड़ने का नहीं था. वे तो बस व्यापारी थे. उन्हें पता था कि इन जहाजों को चलाना या मेंटेन करना उनके बस की बात नहीं है. उन्होंने तुरंत उन सभी पनडुब्बियों और जहाजों को नॉर्वे की एक कंपनी को कबाड़ (स्क्रैप) के भाव बेच दिया. वह लोहा पिघलाकर रिसाइकिल किया गया और पेप्सी को अपने मुनाफे का पैसा मिल गया.
1991 के बाद शुरू हुआ पेप्सी का खराब दौर
यह वह दौर था जब सोवियत संघ टूटने की कगार पर था. पेप्सी ने वहां सैकड़ों प्लांट लगा लिए थे. लेकिन 1991 में जब सोवियत संघ का पतन हुआ, तो पेप्सी के लिए मुश्किलें फिर बढ़ गईं. अब उन्हें एक देश के साथ नहीं, बल्कि रूस, यूक्रेन और कजाकिस्तान जैसे कई अलग-अलग देशों के साथ अलग-अलग सौदे करने थे. उनकी सप्लाई चेन टूट गई, उनके ट्रक बॉर्डर पर फंस गए और जहाजों के सौदे कागजों में उलझ गए.
इसी बीच उनकी प्रतिद्वंदी कंपनी कोका-कोला ने भी रूसी बाजार में आक्रामक एंट्री मारी. पेप्सी, जो कभी रूस का बेताज बादशाह थी, उसे कड़ी टक्कर मिलने लगी. हालांकि पेप्सी ने अपनी पकड़ बनाए रखी, लेकिन वह ‘नेवल पावर’ वाला दौर दोबारा कभी नहीं आया.
बिजनेस स्कूलों में पढ़ाई जाती है ये केस स्टडी
पेप्सी की यह कहानी आज भी हार्वर्ड बिजनेस स्कूल, वार्टन स्कूल ऑफ बिजनेस, और लंदन बिजनेस स्कूल में बार्टर सिस्टम के तहत पढ़ाई जाती है. प्रोफेसर्स यह समझाते हैं कि जब नकदी (Cash) उपलब्ध न हो, तो एसेट्स (Assets) के जरिए सौदे कैसे किए जाते हैं. इसके अलावा अनोखी घटना का विस्तार से वर्णन कई प्रसिद्ध किताबों और आधिकारिक दस्तावेजों में मिलता है.
- कोला वार्स (Cola Wars): यह किताब कोका-कोला और पेप्सी के बीच की दशकों पुरानी जंग पर लिखी गई है. इसमें एक पूरा अध्याय पेप्सी के सोवियत रूस में प्रवेश और उस नौसेना वाले सौदे पर आधारित है.
- सोडा पॉलिटिक्स (Soda Politics): इस किताब में लेखिका ने बताया है कि कैसे सोडा कंपनियों ने वैश्विक राजनीति और देशों की नीतियों को प्रभावित किया. इसमें पेप्सी-सोवियत डील का जिक्र एक बड़े उदाहरण के तौर पर है.
- द न्यू यॉर्क टाइम्स आर्काइव : 1989 और 1990 के समय के न्यूयॉर्क टाइम्स के बिजनेस सेक्शन में इस डील की विस्तृत रिपोर्टिंग हुई थी. इन आर्काइव्स को आज भी रिसर्च के लिए इस्तेमाल किया जाता है.


