एग्रीकल्चर न्यूज़: खाद्यान्न वितरण में ‘श्री अन्न’ को बढ़ावा, स्वास्थ्य, किसान और पर्यावरण के लिए बड़ा कदम!

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झांसी. केंद्र सरकार ने हाल ही में खाद्यान्न वितरण योजना के तहत मोटे अनाज बांटने का निर्देश दिया है. ज्वार, बाजरा, रागी जैसे अनाज, जिन्हें आजकल “श्री अन्न” भी कहा जाता है, भारत में बहुत प्राचीन समय से उपयोग में लाए जाते रहे हैं. हमारी परंपरा और संस्कृति में इन अनाजों का विशेष स्थान रहा है, लेकिन समय के साथ इनका उपयोग कम हो गया था और लोग अधिकतर गेहूं और चावल पर निर्भर हो गए थे. अब सरकार इन्हें फिर से बढ़ावा दे रही है, ताकि लोग इनके पोषण संबंधी लाभों को समझें और अपने आहार में शामिल करें.

सबसे बड़ा फायदा स्वास्थ्य से जुड़ा है, मोटे अनाज में फाइबर, प्रोटीन, आयरन और कैल्शियम भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. ये पचने में आसान होते हैं और शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा प्रदान करते हैं. मधुमेह, मोटापा और हृदय रोग जैसी बीमारियों को नियंत्रित करने में भी ये काफी मददगार साबित होते हैं. इनमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे ब्लड शुगर का स्तर संतुलित रहता है. खाद्यान्न वितरण योजना के तहत गरीब और जरूरतमंद लोगों तक मोटे अनाज पहुंचाए जाएंगे, जिससे उनके पोषण स्तर में सुधार होगा और कुपोषण जैसी समस्याओं को कम करने में सहायता मिलेगी.

खाद्यान्न वितरण में इस बार मोटे अनाज के वितरण पर विशेष जोर

प्रत्येक लाभार्थी को 35 किलोग्राम अनाज दिया जाएगा, जिसमें 14 किलो गेहूं, 11 किलो चावल और 10 किलो ज्वार शामिल होगा. इससे स्पष्ट है कि सरकार मोटे अनाज को मुख्यधारा में लाने के लिए गंभीर प्रयास कर रही है. आखिर क्यों मोटे अनाज के इस्तेमाल पर केंद्र सरकार विशेष जोर दे रही है, इसका उत्तर इनके बहुआयामी लाभों में छिपा हुआ है.

दूसरा बड़ा फायदा किसानों को होगा

ज्वार, बाजरा और रागी जैसी फसलें कम पानी में भी अच्छी तरह उग जाती हैं. भारत जैसे देश में, जहां कई राज्यों में पानी की कमी रहती है, वहां ये फसलें अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं. इनकी खेती में लागत अपेक्षाकृत कम आती है, जिससे किसानों का आर्थिक बोझ घटेगा और उनकी आय बढ़ने की संभावना बनेगी. खासकर सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसानों को इससे बड़ी राहत मिलेगी.

तीसरा फायदा पर्यावरण से जुड़ा है

मोटे अनाज की खेती में रासायनिक खाद और पानी की आवश्यकता कम पड़ती है. इससे मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है और भूमि की उर्वरता लंबे समय तक सुरक्षित रहती है. जल संसाधनों की बचत होती है और पर्यावरण पर दबाव कम पड़ता है. यानी यह कदम पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण और दूरदर्शी पहल है.

चौथा फायदा देश की खाद्य सुरक्षा से संबंधित है

यदि हम केवल चावल और गेहूं पर निर्भर रहेंगे, तो किसी प्राकृतिक आपदा या उत्पादन में कमी की स्थिति में जोखिम बढ़ सकता है. लेकिन जब मोटे अनाज भी खाद्यान्न वितरण प्रणाली का हिस्सा बनेंगे, तो अनाज की विविधता बढ़ेगी और किसी एक फसल पर निर्भरता कम होगी. इससे देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी और आपात परिस्थितियों में भी संतुलन बना रहेगा. खाद्यान्न वितरण योजना में मोटे अनाज को शामिल करने का निर्णय स्वास्थ्य, किसान, पर्यावरण और देश की अर्थव्यवस्था चारों दृष्टिकोण से लाभकारी साबित हो सकता है. केंद्र सरकार का यह कदम भारत को बेहतर पोषण, सतत कृषि और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण प्रयास है.



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