बहराइच: आजादी का नाता बहराइच से बखूबी रहा है. अनेकों सेनानियों का आजादी में योगदान रहा है. इन्हीं सेनानियों में से एक सेनानी ऐसे गुजरे हैं, जिन्होंने अंग्रेजों से विद्रोह कर अपना सब कुछ गवा दिया. जिनका परिवार आम और जामुन की गुठली की रोटी खाने पर मजबूर हो गया था. उन्होंने अंग्रेजों के कोड़े खाने तो स्वीकार किए, लेकिन गुलामी नहीं, आइए ऐसे क्रांतिकारी सेनानियों की पूरी कहानी जानते हैं.
घोड़े से उतारकर पटका था अंग्रेज को, फिर मिली ऐसी सजा!
बहराइच जिले के महसी क्षेत्र में तमाम ऐसे सेनानी गुजरे हैं, जिन्होंने आजादी में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है. इन्हीं सेनानियों में से एक सेनानी दयाशंकर गुजरे हैं, जिन्होंने आजादी और तिरंगे के लिए अपना सब कुछ गवा दिया. उन्होंने किसी चीज की परवाह नहीं की. उनका परिवार चोरों की तरह छिपकर दर-दर भटकता रहा, लेकिन हार नहीं मानी, तब जाकर देश को आजादी मिली.
लोग देखते थे आजादी का सपना!
भारत के अनेकों सेनानियों में से आज बात बहराइच जिले के सेनानी दयाशंकर की, जिनके वंशज आज भी मौजूद हैं जो उस दौर का किस्सा सुनाते नहीं थक रहे. सेनानी दयाशंकर के वंशज मुन्ना पंडित उर्फ राम सरन बताते हैं कि बात 1942 से पहले की है, जब महसी क्षेत्र में इनके बाबा अपने परिवार के साथ रहा करते थे और साथ में कई पशु-पक्षी भी पाल रखे थे.
इनके बारे में जब अंग्रेजों को सूचना मिली तो अपने सिपाहियों को उनके पास कर वसूलने के लिए भेजा, जो घोड़े से गए थे. जैसे सैनिकों ने पहुंचकर पैसे की मांग की, उन्होंने अंग्रेज को घोड़े से नीचे गिरा लिया और जो गाय का दूध दुह रहे थे, उसको खुद पीकर अंग्रेजों को उन्होंने मारा, जिसके बाद अंग्रेज चले गए. फिर फोर्स के साथ आकर इनको पकड़कर ले गए. इसके बाद परिवार के बच्चों और अन्य लोगों को इधर-उधर कर दिया.
तोड़ दी अनाज की भरी डेहरी
इसके अलावा अंग्रेजों ने घर का एक भी समान नहीं छोड़ा. उन्होंने पैरों से मारकर अनाज से भरी मिट्टी की डेहरी तोड़ दी और पूरे गांव के लोगों को सख्त हिदायत दी कि उनकी मदद जो भी करेगा, उनको भी सजा दी जाएगी. इसके बाद बचे हुए लोगों ने आम की गुठली और जामुन की गुठली का सत्तू और रोटी बनाकर कुएं और नदी का पानी पीकर अपना जीवन यापन किया.
बचे हुए लोगों को कोई नहीं पीने देता था अपने घर पानी!
सेनानी दयाशंकर के बचे हुए परिवार के लोग जब किसी के यहां पानी मांगने जाते थे, तो लोग अपना दरवाजा बंद कर लेते थे. कहते थे कि इनको झंडे की छूत लगी हुई है और अगर इनको अपना सामान दोगे तो अंग्रेज हमको भी जेल में बंद कर देंगे. इसलिए कोई पानी नहीं देता था. तब किसी तरीके से इनका परिवार कुएं और नदी का पानी पीकर गुजर-बसर करता था. इसके बाद बचे हुए अन्य सेनानियों ने 1942 में योजना बनाई. फिर बहराइच के घंटाघर से आजादी का बिगुल महात्मा गांधी के साथ फूंका गया, तब जाकर देश को आजादी मिली.


