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17वीं सदी का वह ऐतिहासिक प्रसंग आज भी लोगों को रोमांचित कर देता है, जब मराठा स्वाभिमान के प्रतीक छत्रपति शिवाजी महाराज को मुगल बादशाह औरंगज़ेब ने आगरा किले में नजरबंद कर दिया था. दरबार में कथित अपमान के बाद शुरू हुई यह कहानी केवल कैद की नहीं, बल्कि साहस, रणनीति और अद्भुत चतुराई की मिसाल बन गई. करीब 99 दिनों की नजरबंदी के बाद शिवाजी महाराज ने ऐसी योजना बनाई, जिसने मुगल सुरक्षा व्यवस्था को भी चौंका दिया. फलों की टोकरियों में छिपकर आगरा किले से उनका निकल जाना भारतीय इतिहास की सबसे रोचक घटनाओं में गिना जाता है.
आगरा. उत्तर प्रदेश के आगरा में कई वर्षों तक मुगलों का शासन रहा. मुगल बादशाहों ने आगरा किले में रहकर राज किया. इसी ऐतिहासिक किले से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग छत्रपति शिवाजी महाराज की नजरबंदी का है. वरिष्ठ इतिहासकारों के अनुसार, साल 1666 ईस्वी में मुगल बादशाह औरंगज़ेब ने छलपूर्वक छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके पुत्र संभाजी को आगरा किले की कोठी मीना बाज़ार स्थित एक हवेली में नजरबंद कर दिया था. बताया जाता है कि 12 मई 1666 को दरबार में उचित सम्मान न मिलने और विरोध दर्ज कराने के बाद शिवाजी महाराज को कैद कर लिया गया.
दीवान-ए-खास में हुआ अपमान, बढ़ा विवाद
आगरा के वरिष्ठ इतिहासकार प्रोफेसर अनुराग पालीवाल के अनुसार, जब शिवाजी महाराज आगरा किले के दीवान-ए-खास में औरंगज़ेब से मिलने पहुंचे, तो उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं दिया गया. दरबार में उपेक्षा महसूस होने पर शिवाजी महाराज ने इसका विरोध किया. इस विरोध से नाराज़ होकर औरंगज़ेब ने उन्हें नजरबंद करने का आदेश दे दिया. इसके बाद मुगल सैनिकों ने शिवाजी महाराज और उनके पुत्र संभाजी को कड़ी निगरानी में बंदी बना लिया.
चतुराई से रची भागने की योजना
इतिहासकारों के अनुसार, शिवाजी महाराज केवल वीर योद्धा ही नहीं बल्कि अत्यंत बुद्धिमान और रणनीतिकार भी थे. नजरबंदी के दौरान उन्होंने बीमार होने का नाटक शुरू किया. इस दौरान दरबार में मिठाई और फलों की टोकरियां भेजने की अनुमति ली गई. 17 अगस्त 1666 को शिवाजी महाराज और उनके पुत्र संभाजी फलों और मिठाइयों से भरी टोकरियों में छिपकर कड़ी सुरक्षा को चकमा देते हुए आगरा किले से बाहर निकलने में सफल रहे. बताया जाता है कि वे लगभग 99 दिनों तक नजरबंद रहे. आगरा से निकलने के बाद उन्होंने वेश बदलकर मथुरा और काशी (वाराणसी) के रास्ते होते हुए महाराष्ट्र के रायगढ़ पहुंचने में सफलता प्राप्त की. यह घटना भारतीय इतिहास में साहस, रणनीति और चतुराई का अद्भुत उदाहरण मानी जाती है.
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