ग्रेटर नोएडा: ग्रेटर नोएडा में आयोजित ग्रैंड पेरेंट्स डे केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह दो पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी को कम करने की एक भावनात्मक और सार्थक पहल बनकर सामने आया. कार्यक्रम में करीब डेढ़ सौ से अधिक दादा-दादी और नाना-नानी शामिल हुए. बच्चों की प्रस्तुतियों, साझा यादों और भावनाओं से भरे इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि यदि परिवार और समाज मिलकर प्रयास करें, तो शायद वृद्धाश्रमों की जरूरत ही कम पड़ जाए.
कार्यक्रम में मेरठ से आईं पारुल शर्मा ने बताया कि उनका नाती एलकेजी में पढ़ता है और वे विशेष रूप से इस आयोजन में भाग लेने के लिए सुबह-सुबह तैयार होकर पहुंचीं. उन्होंने कहा कि स्कूलों में अक्सर पैरेंट-टीचर मीटिंग होती है, लेकिन दादा-दादी को शायद ही कभी बुलाया जाता है. इस पहल से उन्हें बेहद सम्मान और अपनापन महसूस हुआ. उनका मानना है कि जब स्कूल खुद ग्रैंड पेरेंट्स को याद करता है, तो यह बच्चों के मन में भी बुजुर्गों के प्रति आदर की भावना को मजबूत करता है.
पारिवारिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का माध्यम
मनमोहन आनंद ने इस आयोजन को पुरानी पारिवारिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का माध्यम बताया. उन्होंने कहा कि आज समाज सिकुड़ता जा रहा है, संयुक्त परिवार कम हो रहे हैं और रिश्तों में दूरी बढ़ती जा रही है. ऐसे में जब बच्चे और उनके ग्रैंड पेरेंट्स एक मंच पर साथ आते हैं, तो एक नई सोच जन्म लेती है. बच्चों को यह समझ आता है कि दादा-दादी केवल परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि अनुभव और संस्कारों का खजाना हैं. वहीं बुजुर्गों को भी यह एहसास होता है कि वे आज भी परिवार और समाज के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं.
बच्चों को दादा-दादी से मिलने का अवसर
इसी कड़ी में ग्रेटर नोएडा स्थित जेपी पब्लिक स्कूल द्वारा यह आयोजन किया गया, जहां पूरे परिसर में उत्साह और आत्मीयता का माहौल देखने को मिला. बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए और अपने ग्रैंड पेरेंट्स को समर्पित गीत, नृत्य और कविताओं के जरिए सम्मान व्यक्त किया.
चंद्रशेखर कौटिल्य ने कहा कि आज की पीढ़ी रोजगार के कारण अलग-अलग शहरों में रहती है. कई बार माता-पिता और बच्चे अलग जगहों पर होते हैं, जिससे दादा-दादी से मिलने का अवसर कम मिलता है. ऐसे आयोजनों से बच्चों को अपने बुजुर्गों के साथ समय बिताने का मौका मिलता है, जो उनके भावनात्मक विकास के लिए बेहद जरूरी है. उन्होंने इसे सराहनीय पहल बताते हुए कहा कि इस तरह के कार्यक्रम हर स्कूल में नियमित रूप से होने चाहिए.
ग्रैंड पेरेंट्स के साथ समय बिताने का अवसर
आरडी धानोल ने भी इस बात पर जोर दिया कि छोटे बच्चों को अपने ग्रैंड पेरेंट्स के साथ समय बिताने का अवसर मिलना चाहिए. उनका मानना है कि बच्चों के व्यक्तित्व और सोच के निर्माण में बुजुर्गों की भूमिका बेहद अहम होती है. जब बच्चे अपने दादा-दादी से जीवन के अनुभव सुनते हैं, तो उनमें संवेदनशीलता और संस्कार स्वतः विकसित होते हैं.
स्कूल की वाइस प्रिंसिपल ने क्या कहा?
स्कूल की वाइस प्रिंसिपल अनीता पिल्लई ने बताया कि यह आयोजन सीबीएसई के दिशा-निर्देशों के अनुरूप जेनरेशन बॉन्ड को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया. कार्यक्रम के दौरान ग्रैंड पेरेंट्स ने अपने जीवन की यादें साझा कीं, जबकि बच्चों ने मंच से यह बताया कि वे अपने दादा-दादी को अपना ‘हीरो’ क्यों मानते हैं.
उन्होंने कहा कि आज के समय में जब कई परिवारों में बुजुर्ग खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं और कुछ मामलों में उन्हें वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड़ता है, ऐसे कार्यक्रम समाज को सकारात्मक संदेश देते हैं. यह आयोजन केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक सोच रिश्तों को सहेजने और पीढ़ियों के बीच संवाद बढ़ाने की सोच का है.


