दीवारों से कैनवास तक, इप्शा पाठक ने कोहबर कला को दिया आधुनिक रूप

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दीवारों से कैनवास तक, इप्शा पाठक ने कोहबर कला को दिया आधुनिक रूप

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बदलते समय और आधुनिक शादियों के दौर में जहां पारंपरिक कोहबर पेंटिंग धीरे-धीरे दीवारों से गायब होती जा रही थी, वहीं मुजफ्फरपुर की मधुबनी पेंटिंग आर्टिस्ट इप्शा पाठक ने इस कला को नया जीवन दे दिया है. उन्होंने कोहबर परंपरा को दीवारों से निकालकर कपड़ों और कैनवास पर उतारते हुए इसे आधुनिक स्वरूप दिया, जिससे यह न सिर्फ सजावटी कला बन गई, बल्कि शादी की एक यादगार विरासत के रूप में देश-विदेश तक अपनी पहचान बना रही है. रिपोर्ट- आदित्य राज

बदलते समय के साथ जब परंपराएं धीरे-धीरे सिमटती जा रही हैं, ऐसे दौर में मुजफ्फरपुर की मधुबनी पेंटिंग आर्टिस्ट इप्शा पाठक ने पारंपरिक कोहबर कला को आधुनिक स्वरूप देकर नई पहचान दी है. कभी विवाह के समय घरों की दीवारों पर बनाई जाने वाली कोहबर पेंटिंग आज बैंकेट हॉल और होटलों में होने वाली शादियों के कारण लगभग गायब होती जा रही है. इप्शा जैसे कलाकारों के नवाचार से यह परंपरा फिर से जीवित हो रही है.

कोहबर पेंटिंग विंध्य और मिथिला क्षेत्र की शादियों में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा रही है. विवाह से पहले दूल्हा-दुल्हन के कमरे की दीवारों पर कोहबर बनाया जाता था, जिसमें स्वस्तिक, कमल, मछली और वर-वधू के नाम अंकित किए जाते थे. यह पेंटिंग सुख, समृद्धि और वैवाहिक जीवन की मंगल कामना का प्रतीक मानी जाती है. आधुनिक समय में शादियों का आयोजन बैंकेट हॉल और होटलों में होने लगा, जहां दीवारों पर पेंटिंग करना संभव नहीं रह गया.

इसी चुनौती को अवसर में बदलते हुए इप्शा पाठक ने कोहबर कला को दीवारों से निकालकर कपड़ों और कैनवास पर उतार दिया. उन्होंने कोहबर पेंटिंग को डिजाइनर तरीके से तैयार करना शुरू किया, जिसे फ्रेम कर घरों में सजाया जा सकता है. शादी के बाद नवविवाहित जोड़े इसे स्मृति चिह्न के रूप में अपने साथ ले जाते हैं, जिससे यह परंपरा लंबे समय तक संजोकर रखी जा सके.

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इप्शा बताती हैं कि शुरुआत में इस अनोखे प्रयोग को लोगों तक पहुंचाना आसान नहीं था. मार्केटिंग एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन जैसे-जैसे लोगों ने कोहबर पेंटिंग के इस नए रूप को समझा, इसकी मांग तेजी से बढ़ने लगी. आज उनकी बनाई कोहबर पेंटिंग न केवल बिहार, बल्कि दिल्ली, बेंगलुरु और खड़गपुर समेत देश के कई हिस्सों में लोकप्रिय हो चुकी है. इतना ही नहीं, उनकी पेंटिंग विदेशों तक भी भेजी जा रही हैं.

इप्शा पाठक के अनुसार, कपड़ों पर कोहबर पेंटिंग करने से इसे सुरक्षित रखना और पीढ़ियों तक सहेज कर रखना आसान हो गया है. यह कला पारंपरिक महत्व को बनाए रखते हुए आधुनिक जीवनशैली के अनुरूप भी ढल गई है. कीमतों की बात करें तो इप्शा ने बताया कि कोहबर पेंटिंग की शुरुआती कीमत 1500 रुपये से शुरू होती है, जो साइज और डिजाइन के अनुसार बढ़ती है. फिलहाल शादी का सीजन चल रहा है, ऐसे में कोहबर पेंटिंग की डिमांड काफी ज्यादा है.

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