नवग्रह सकरा और तेलिया बुर्ज में दिखती अनोखी कारीगरी, वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बनी प्राचीन निर्माण शैली

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Amethi latest news : अमेठी जिले में मौजूद गुप्तकालीन धरोहरें आज भी अपनी मजबूती और खूबसूरती से लोगों को हैरान कर रही हैं. बिना सीमेंट और आधुनिक तकनीक के बनी ये इमारतें सदियों बाद भी अडिग खड़ी हैं. राजा का राजमहल, बावली, नवग्रह सकरा और तेलिया बुर्ज जैसी संरचनाएं इतिहास और वास्तुकला का अद्भुत संगम प्रस्तुत करती हैं.

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अमेठी : आधुनिक विज्ञान ने जहां मंगल ग्रह तक अपनी पहुंच बना ली है, वहीं अमेठी जिले में मौजूद गुप्तकालीन धरोहरें आज भी इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल का विषय बनी हुई हैं. बिना सीमेंट और आधुनिक तकनीक के निर्मित ये इमारतें सदियों बाद भी मजबूती से खड़ी हैं और अपनी अनोखी वास्तुकला से लोगों को आकर्षित कर रही हैं.

राजा का राजमहल, हजार साल पुरानी भव्यता
अमेठी जिले की प्रमुख धरोहरों में राजा का राजमहल सबसे खास माना जाता है. करीब एक हजार वर्ष पुराना बताया जाने वाला यह महल अपनी भव्य वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है. चारों ओर बने तहखाने, विशाल राजदरबार और दीवारों पर उकेरी गई कलाकृतियां उस समय की उत्कृष्ट शिल्पकला का प्रमाण देती हैं. पत्थरों की मजबूती और संरचना देखकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं.

बावली का कुआं, बारादरी शैली का अद्भुत नमूना
राजमहल से कुछ दूरी पर स्थित बावली का कुआं भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है. यह कुआं काफी गहरा है और बारादरी शैली में निर्मित है. मान्यता है कि प्राचीन काल में रानी अपनी सखियों के साथ यहां स्नान करने आती थीं. इसकी संरचना और पत्थरों की सटीक जड़ाई दर्शाती है कि उस समय निर्माण कला कितनी विकसित थी. यह स्थल आज भी पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करता है.

नवग्रह सकरा और तेलिया बुर्ज, ईंटों की अनूठी कारीगरी
अमेठी जिले के गौरीगंज में स्थित नवग्रह सकरा और मुसाफिरखाना के गन्नौर गांव में बना तेलिया बुर्ज भी प्राचीन वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं. खास बात यह है कि इन धरोहरों का निर्माण विशेष प्रकार की ईंटों से किया गया है, जो आज भी मजबूती से खड़ी हैं. इन संरचनाओं की डिजाइन और संतुलन आधुनिक इंजीनियरिंग को भी चुनौती देते नजर आते हैं.

बिना सीमेंट के अडिग निर्माण
इतिहासकार विनोद पांडे, जिन्होंने इन इमारतों पर शोध किया है, बताते हैं कि सदियां बीत जाने, आंधी-तूफान और भीषण गर्मी सहने के बावजूद इन पत्थरों की चमक फीकी नहीं पड़ी है. बिना सीमेंट या कंक्रीट के पत्थरों को इस प्रकार जोड़ा गया है कि इमारतें आज भी अपने मूल स्वरूप में खड़ी हैं. यह उस समय की उन्नत निर्माण तकनीक का प्रमाण है.

गुप्तकाल की अनूठी पहचान
इतिहासकारों के अनुसार कुछ इमारतें गुप्तकालीन शासन में बनीं और उसी काल के साथ उनका निर्माण थम गया. बाद के समय में वैसी संरचनाएं दोबारा नहीं बन सकीं. यही कारण है कि इन धरोहरों को विशिष्ट और दुर्लभ माना जाता है. जहां दुनिया की कई पुरानी इमारतें खंडहर में बदल गईं, वहीं अमेठी की ये धरोहरें आज भी मजबूती से खड़ी हैं और अपने समृद्ध इतिहास की कहानी बयां कर रही हैं.

पर्यटन और विरासत संरक्षण की जरूरत
इन ऐतिहासिक स्थलों को देखने के लिए आज भी लोग दूर-दूर से आते हैं. यदि इनका संरक्षण और प्रचार-प्रसार बेहतर ढंग से किया जाए तो यह क्षेत्र पर्यटन के मानचित्र पर और मजबूती से उभर सकता है. अमेठी की ये गुप्तकालीन धरोहरें न केवल इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं बल्कि भारतीय वास्तुकला की अद्भुत विरासत का जीवंत प्रमाण भी हैं.



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