न सजा, न शर्मिंदगी! अगर बच्चे की गलतियों को सच में सुधारना है, तो अपनाएं ये तरीके; हर बात मानेंगे आपकी

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‘नो-शेम पेरेंटिंग’,  इसका सीधा मतलब है बच्चे के व्यवहार को उसकी पहचान से अलग करना. जब हम कहते हैं, “तुम बहुत बुरे लड़के हो,” तो हम उसे शर्मिंदा कर रहे हैं. लेकिन जब हम कहते हैं, “तुम्हारा यह व्यवहार सही नहीं था,” तो हम उसे सुधारने का मौका दे रहे हैं. यहाँ लक्ष्य बच्चे को डराना नहीं, बल्कि उसे अपनी गलती का अहसास कराना है.

मशहूर चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट डॉ. हैम गिनॉट (Dr. Haim Ginott) के अनुसार, “बच्चे उसी तरह व्यवहार करते हैं जैसा वे महसूस करते हैं. अगर हम उन्हें अच्छा महसूस करने में मदद करेंगे (प्यार और सम्मान देकर), तो वे खुद-ब-खुद अच्छा व्यवहार करना शुरू कर देंगे.

वहीं, मशहूर शोधकर्ता और लेखिका डॉ. ब्रेने ब्राउन (Dr. Brené Brown) ने अपनी एक किताब में कहा था, “शर्मिंदगी (Shame) सुधार का साधन नहीं है, बल्कि यह बदलाव में सबसे बड़ी बाधा है. जब हम बच्चों को उनके गलत व्यवहार के लिए शर्मिंदा करते हैं, तो वे अपनी गलती सुधारने के बजाय खुद को ‘बुरा’ मानने लगते हैं.”

गलतियों को सुधारने के ये रहे परफेक्‍ट तरीके-

1.’सजा’ नहीं, बच्‍चों को परिणाम समझाएं
सजा का मतलब होता है बच्चे को तकलीफ देना, जबकि ‘परिणाम’ उसे जिम्मेदारी सिखाता है. अगर बच्चे ने खिलौना तोड़ दिया है, तो उसे डांटने के बजाय उसे समझाएं कि अब उसके पास खेलने के लिए वह खिलौना नहीं होगा. यह उसे अगली बार चीजों का ख्याल रखना सिखाएगा.

2.चिल्लाने के बजाय ‘कनेक्शन’ बनाएं
जब बच्चा गलती करता है, तो वह पहले से ही डरा हुआ होता है. ऐसे में चिल्लाने से वह आपसे दूर हो जाएगा. उसके करीब बैठें, उसकी आंखों में आंखें डालकर बात करें और शांत रहकर पूछें कि क्या हुआ था. जब बच्चा सुरक्षित महसूस करता है, तो वह सच बोलता है और आपकी बात बेहतर सुनता है.

3.’टाइम-आउट’ नहीं, ‘टाइम-इन’ दें
अक्सर पेरेंट्स बच्चे को अकेले कमरे में बंद कर देते हैं (Time-out). इसकी जगह ‘Time-in’ का इस्तेमाल करें. उसे अपने पास बैठाएं और भावनाओं को समझने में मदद करें. उससे पूछें, “क्या तुम गुस्से में हो? क्या तुम दुखी हो?” इससे बच्चा अपनी भावनाओं को कंट्रोल करना सीखता है.

इस तरीके के जबरदस्त फायदे-

आत्मसम्मान (Self-Esteem) बढ़ता है: जब बच्चे को बात-बात पर शर्मिंदा नहीं किया जाता, तो उसका खुद पर भरोसा बढ़ता है. वह खुद को एक ‘अच्छे इंसान’ के रूप में देखता है जो गलती सुधार सकता है.

ईमानदारी बढ़ती है: सजा के डर से बच्चे झूठ बोलना सीखते हैं. ‘नो-शेम’ माहौल में वे बेझिझक अपनी गलती मान लेते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उन्हें प्यार से समझाया जाएगा.

मजबूत होती है बॉन्डिंग: यह तरीका आपके और बच्चे के बीच भरोसे की दीवार खड़ी करता है. बड़ा होने पर भी बच्चा अपनी समस्याओं के लिए सबसे पहले आपके पास आएगा.

पेरेंट्स के लिए खास टिप:
नो-शेम पेरेंटिंग सिर्फ बच्चों के लिए नहीं, पेरेंट्स के लिए भी है. अगर कभी आपा खोकर आप बच्चे पर चिल्ला दें, तो खुद को शर्मिंदा न करें. बच्चे से माफी मांगें और उन्हें दिखाएं कि बड़े भी अपनी गलती सुधार सकते हैं. यह उनके लिए सबसे बड़ा सबक होगा.

याद रखें, अनुशासन का मतलब डर पैदा करना नहीं, बल्कि सही दिशा दिखाना है. इन बातों को अपनाकर आप न सिर्फ एक जिम्मेदार नागरिक तैयार कर रहे हैं, बल्कि अपने घर में प्यार और सम्मान की नींव रख रहे हैं.



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