पैराशूट नारियल तेल की वो कहानी, जो नहीं जानते आप! क्यों इस पर नहीं लिखा होता हेयर ऑयल?

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“हर्ष, मुझे लगता है कि तुम्हें अब हार मान लेनी चाहिए. हम तुमसे एक बड़ा मार्केट शेयर छीन लेंगे. अगर तुम अभी (कंपनी) बेच देते हो, तो हम तुम्हें इसकी अच्छी कीमत देंगे.”

इसके जवाब में हर्ष कहते हैं, “केकी, आप सही हो सकते हैं कि आप मुझसे बड़ा मार्केट शेयर छीन लेंगे, लेकिन मैं आपको बता दूं, यह आपके लिए कतई आसान नहीं होगा. मैं आपको बहुत कड़ी टक्कर दूंगा.”

ये कोई फिल्मी डायलॉग नहीं था, बल्कि सच में हुई एक बातचीत का हिस्सा है. यह कहानी है उस पैराशूट नारियल तेल की, जो हर घर में पाया जाता है. यह कहानी है मैरिको (Marico) बनाम हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL) के बीच हुई एक दिलचस्प जंग की.

बात 1991 की है. मुंबई के चर्चगेट स्थित हिंदुस्तान यूनिलीवर के आलीशान हेडक्वार्टर के एक बंद कमरे में 40 साल के हर्ष मारीवाला के सामने भारत के सबसे ताकतवर कॉर्पोरेट लीडर्स में से एक केकी दादीसेठ (Keki Dadiseth) बैठे थे. कमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि हर्ष को अपनी धड़कनें तक सुनाई दे रही थीं. उस समय HUL का सालाना बजट मैरिको की कुल वैल्यू से 10 गुना ज्यादा था. आप सोच सकते हैं कि वहां का माहौल कैसा रहा होगा. केकी दादीसेठ HUL के चेयरमैन थे. वे चाहते थे कि मैरिको अपना बिजनेस HUL के बेच दे.

हर्ष ने अपनी नजरें नहीं झुकाईं. उन्होंने धीरे से कुर्सी पीछे खिसकाई और बस इतना कहा कि वे कड़ी टक्कर देंगे. HUL के ऑफर को न कहने के बाद हर्ष कमरे से बाहर निकल आए, लेकिन उन्हें पता था कि उन्होंने एक ऐसी जंग का ऐलान कर दिया है, जिसमें उनकी हार लगभग तय थी. यह कहानी सिर्फ एक बिजनेस की नहीं है, यह कहानी है उस ‘ईगो’ और ‘इमोशन’ की, जिसने भारतीय घरों की रसोई और ड्रेसिंग टेबल पर रखी गई शीशियों में जगह पाने के लिए मशक्कत की.

न्यूयॉर्क नहीं गए, पापा की दुकान पर बैठे हर्ष

1971 में जब हर्ष मारीवाला ने कॉलेज खत्म किया, तो उनके पास विकल्प था कि वे न्यूयॉर्क जाकर MBA करें या फिर अपने पिता की पुरानी ‘बॉम्बे ऑयल इंडस्ट्रीज’ में बैठें. उन्होंने दूसरा रास्ता चुना. उस समय उनका दफ्तर दक्षिण मुंबई के ‘मस्जिद बंदर’ में था. एक ऐसी जगह पर, जहां चारों तरफ सिर्फ मसालों की गंध और ट्रक ड्राइवरों का शोर था.

वहां नारियल तेल ‘कमोडिटी’ की तरह बिकता था. यानी, बड़े-बड़े 15 किलो के टिन के डिब्बे, जिन पर कोई ब्रांड नहीं होता था. दुकानदार इसे खुला बेचते थे. हर्ष ने देखा कि उन टिन के डिब्बों में जंग लग जाती थी, वे दिखने में गंदे थे और उन्हें इस्तेमाल करना मुश्किल था.

एक दिन, मस्जिद बंदर की एक छोटी-सी दुकान के बाहर खड़े हर्ष ने देखा कि एक औरत तेल खरीदने आई, लेकिन डिब्बे से तेल निकालते वक्त उसके हाथ गंदे हो गए. यहीं से हर्ष के दिमाग में पहली बार ‘ब्रांडिंग’ का ख्याल आया. उन्होंने सोचा, “क्यों न इसे छोटे और साफ पैक में बेचा जाए?”

गोल ही क्यों होती है इसकी बोतल?

हर्ष ने तय किया कि वे तेल को प्लास्टिक की बोतलों में बेचेंगे. आज यह मामूली बात लगती है, लेकिन 1980 के दशक में यह एक पागलपन भरा विचार प्रतीत होता था. उस समय नारियल तेल के लिए सिर्फ टिन का इस्तेमाल होता था, क्योंकि लोगों का मानना था कि प्लास्टिक में तेल रखने से वह खराब हो जाएगा या उसकी खुशबू उड़ जाएगी.

सबसे बड़ी चुनौती ‘चूहे’ थे. किराना दुकानों में चूहों का आतंक होता था. जब हर्ष ने पहली बार प्लास्टिक की बोतलें सैंपल के तौर पर दीं, तो चूहों ने उन्हें कुतर दिया, क्योंकि उन्हें नारियल तेल की महक आकर्षित करती थी. पूरे बाजार में शोर मच गया कि “मारीवाला का आईडिया फ्लॉप है.”

हर्ष पीछे नहीं हटे. उन्होंने एक ऐसी ‘लीक-प्रूफ’ और ‘स्क्वायर शेप’ बोतल डिजाइन करवाई, जिसे चूहे आसानी से पकड़ न सकें. उन्होंने खुद चूहे पिंजरे में मंगवाए और हफ्तों तक टेस्ट किया कि वे बोतल को काट पाते हैं या नहीं. जब चूहे असफल रहे, तब जन्म हुआ पैराशूट ऑयल की उस मशहूर नीली बोतल का, जो आज भी लगभग हर घर में देखने को मिल जाती है. यह भारत में FMCG क्रांति की पहली आहट थी.

1991 का वह सीन: जब मिली बड़ी चुनौती

जैसे ही पैराशूट ने बाजार पकड़ना शुरू किया, दुनिया की सबसे बड़ी कंज्यूमर गुड्स कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL) की नजर इस पर पड़ी. HUL को लगा कि एक छोटी-सी कंपनी उनके साम्राज्य को चुनौती दे रही है. उन्होंने पहले मैरिको को खरीदने का ऑफर दिया (जैसा कि ऊपर बताया गया है), और जब हर्ष ने मना कर दिया, तो HUL ने अपना हथियार लॉन्च किया- निहार (Nihar) नारियल तेल.

HUL ने तय किया था कि वे मैरिको को आर्थिक रूप से तोड़ देंगे. उन्होंने ‘निहार’ की कीमतें इतनी कम कर दीं कि मैरिको के लिए उस कीमत पर तेल बेचना मतलब सीधा घाटा सहना था.

हेयर ऑयल को बना दिया कुकिंग ऑयल!

हर्ष मारीवाला को यह बात खटक रही थी. वे रात-रातभर जगकर इस समस्या का समाधान खोजने में जुटे रहते. एक दिन रात में मैरिको के छोटे से दफ्तर में हर्ष अपने चार भरोसेमंद साथियों के साथ बैठे मनन कर रहे थे. एक मैनेजर ने हताशा में कहा, “सर, HUL ने रिटेलर्स को 30% ज्यादा मार्जिन देना शुरू कर दिया है. हमारी सप्लाई चेन टूट रही है.”

उसी समय हर्ष के साथ कंपनी के लीगल हेड भी थे. हर्थ ने पूछा, “अगर हम बोतल से Hair Oil शब्द हटा दें, तो क्या होगा?” लीगल हेड ने कहा, “सरकार हम पर टैक्स चोरी का दावा कर सकती है.” हर्ष ने फिर पूछा कि अगर तेल 100% शुद्ध है और खाने योग्य है, तो हम सच ही तो कह रहे हैं. इसमें टैक्स चोरी कैसी?

उन्होंने तय किया कि वे HUL से विज्ञापनों में नहीं, बल्कि सरकार की ‘टैक्स बुक’ में लड़ेंगे. रातों-रात बोतलों का लेबल बदल दिया गया. पैराशूट की बोतलों से ‘हेयर ऑयल’ शब्द गायब हो गया और उसकी जगह लिखा गया 100% Pure Coconut Oil. इस एक शब्द के बदलाव ने टैक्स का बोझ इतना कम कर दिया कि मैरिको अपनी कीमतें HUL से भी कम कर पाई, वह भी बिना अपना मुनाफा घटाए. दरअसल, कॉस्मेटिक प्रॉडक्ट्स पर टैक्स ज्यादा था, जबकि कुकिंग ऑयल पर कम. हर्ष मारीवाला ने सही समय पर सही तीर चलाया, जो निशाने पर जा लगा. यह सिर्फ एक शब्द का बदलाव नहीं था, यह HUL की लड़ाई का सीधा जवाब था.

HUL जो ‘निहार’ को पूरी तरह एक कॉस्मेटिक ब्रांड के रूप में बेच रहा था, इस मोर्चे पर पिछड़ गया. मामला कोर्ट तक गया, लेकिन हर्ष मारीवाला यह साबित करने में सफल रहे कि उनका तेल इतना शुद्ध है कि उसे खाया जा सकता है.

बिजनेस मॉडल: लॉयलिटी बनाम डिस्काउंट

हर्ष ने HUL के साथ ‘ब्रांड वार’ भी लड़ा. उन्होंने विज्ञापनों में तेल की शुद्धता (Purity) को केंद्र बनाया. उन्होंने एक ऐसा बिजनेस मॉडल तैयार किया, जिसे आज Direct-to-Retailer कहा जाता है. उन्होंने बिचौलियों को कम किया और सीधे छोटे दुकानदारों तक पहुंचे. उन्होंने सफोला (Saffola) को हार्ट-हेल्थ से जोड़कर एक प्रीमियम केटेगरी खड़ी कर दी. हर्ष जानते थे कि अगर भारतीय मां को यह यकीन हो जाए कि पैराशूट ही उसके बच्चे के बालों के लिए सबसे शुद्ध है, तो वह दूसरा तेल कभी नहीं खरीदेगी. HUL ने करोड़ों रुपये मार्केटिंग में झोंक दिए, लेकिन पैराशूट का मार्केट शेयर कम होने के बजाय बढ़ता गया. ग्राहकों के लिए ‘नीली बोतल’ का मतलब सिर्फ तेल नहीं, बल्कि भरोसा बन गया था.

2006: जब शिकारी खुद शिकार बन गया

यह जंग 13 साल तक चली. 1991 से 2004 तक HUL ने हर मुमकिन कोशिश की कि मैरिको को घुटनों पर लाया जा सके. लेकिन साल 2005 आते-आते पासा पलट गया. HUL के लिए निहार को चलाना भी एक बड़ा बोझ बन गया था, क्योंकि उनका मार्केटिंग खर्च उनकी कमाई से कहीं ज्यादा था.

फिर एक सुबह खबर आई, जिसने पूरे कॉर्पोरेट जगत को चौंका दिया. हिंदुस्तान यूनिलीवर ने हार मान ली थी. उन्होंने मैरिको को ऑफर दिया कि वे अपना ब्रांड निहार बेचना चाहते हैं. वही हर्ष मारीवाला, जिन्हें कभी कंपनी बेचने को कहा गया था, उन्होंने लगभग 216 करोड़ रुपये में HUL का निहार ब्रांड खरीद लिया. यह भारतीय बिजनेस इतिहास का सबसे बड़ा ‘रिवर्स टेकओवर’ जैसा पल था. एक छोटी-सी देसी कंपनी ने एक ग्लोबल जाइंट को खदेड़ दिया था.

सफलता का रास्ता कभी सीधा नहीं रहा. 2012 के आसपास जब कच्चा तेल (Copra) महंगा हुआ, तो मैरिको के मुनाफे पर असर पड़ा. कई बार नए प्रोडक्ट्स (जैसे हेयर जैल या बॉडी लोशन) फेल भी हुए. लेकिन हर्ष हमेशा कहते रहे, “बदलाव से मत डरो.”

आज मैरिको की स्थिति

  • Net Worth/Market Cap: मार्च 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार मैरिको का मार्केट कैपिटलाइजेशन ₹85,000 करोड़ के करीब है.
  • ग्लोबल मौजूदगी: आज वियतनाम, बांग्लादेश और मिडिल ईस्ट के बाजारों में मैरिको का दबदबा है.
  • प्रोडक्ट में विविधता: पैराशूट और सफोला के अलावा, कंपनी ने Beardo जैसे नए जमाने के स्टार्टअप्स को खरीदकर युवाओं के बीच भी अपनी जगह बना ली है.

आज हर्ष मारीवाला 70 साल से ऊपर के हैं और उन्होंने कंपनी की कमान सौगत गुप्ता को सौंप दी है. लेकिन उनकी कहानी प्रेरणा देने वाली है. उन्होंने साबित कर दिया कि एक ‘यूनिकॉर्न’ बनने के लिए सिर्फ फंडिंग की जरूरत नहीं होती, बल्कि उस ‘जिद’ की जरूरत होती है जो आपको बड़े से बड़े तूफान के सामने झुकने न दे.



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