पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है. आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर जिस तरह की राजनीतिक हलचल दिखाई दे रही है, उससे साफ है कि मुकाबला महज सत्ता परिवर्तन का नहीं है. यह लड़ाई राजनीतिक वर्चस्व और वैचारिक प्रभाव की प्रतिष्ठा का है. सत्तारूढ़ ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की कोशिश है कि चुनावी लड़ाई को फिर से ‘दीदी बनाम मोदी’ के फ्रेम में सीमित कर दिया जाए, जबकि भाजपा राज्य में एक विश्वसनीय स्थानीय चेहरा और वैकल्पिक शासन मॉडल प्रस्तुत करने की चुनौती से जूझ रही है. यह संघर्ष केवल व्यक्तित्वों का नहीं, बल्कि पिछले डेढ़ दशक में बदले बंगाल के राजनीतिक चरित्र का भी है. बीजेपी विपक्ष के इस मजबूत गढ़ पर कब्जा कर 2029 का अपना रास्ता साफ करना चाहती है. वहीं ममता लागातार चौथी बार मुख्यमंत्री की शपथ लेकर विपक्षी गठबंधन की सबसे ताकतवर और कद्दावर नेता के रूप में खुद को भावी प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में स्थापित करना चाहती हैं.
तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमों और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की छवि एक जुझारू नेता की है. उनकी आक्रामक राजनीतिक शैली उन्हें उनके वोटरों में लाकप्रिय बनाती हैं. बंगाल की राजनीति में एक बात कही जाती है कि जो सड़क जीत लेता है वह चुनाव जीत लेता है. फिलहाल तो ममता सड़क पर आगे हैं और भाजपा के खिलाफ आक्रामक हैं. एसआईआर के खिलाफ वह सड़कों पर हैं. लेकिन भ्रष्टाचार और सुशासन को लेकर वह बुरी तरह से घिरी हुई हैं. ऊपर से डेढ़ दशक की एंटी इन्कंबेंसी भी है. भाजपा ममता को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेर रही है. उसे उम्मीद है कि इस बार ममता का किला ढहाया जा सकता है. पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले 2024 के लोकसभा चुनाव में उसके वोट शोयर भी बढ़े हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल और भाजपा के बीच वोटों का अंतर करीब 10 फिसदी था. जो पिछले लोकसभा चुनाव में घट कर करीब 7 फीसदी रह गया है. भाजपा को लगता है कि ममता के खिलाफ भ्रष्टाचार और एंटी इन्कंबेंसी के साथ-साथ बंगलादेशी घुसपैठियों को शरण देना और मुस्लिम तुष्टिकरण का मुद्दा उनके हक में है. मोदी का चेहरा और अमित शाह की रणनीति इस बार जरूर दीदी को बंगाल से बाहर का रास्ता दिखा देगी.
यदि पिछले तीन विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है. 2011 में वाममोर्चे के 34 वर्ष पुराने शासन का अंत हुआ और तृणमूल कांग्रेस ने 294 में से 184 सीटें जीतकर सत्ता संभाली. उस चुनाव में उसका वोट शेयर लगभग 39 प्रतिशत था. जबकि तब भाजपा का प्रभाव नगण्य था और उसका वोट प्रतिशत लगभग चार प्रतिशत के आसपास सिमटा हुआ था. 2016 में तृणमूल ने अपनी पकड़ और मजबूत की. उसकी सीट भी बढ़ी और वोट शेयर भी. उसने 211 सीटें जीतीं और वोट शेयर लगभग 45 प्रतिशत तक पहुंच गया. भाजपा तब भी हाशिये पर थी. हालांकि उसका वोट प्रतिशत दस प्रतिशत के आसपास पहुंचने लगा था. लेकिन यह एक संभावित विस्तार की भूमिका लिख रहा था. 2021 का चुनाव निर्णायक रूप से द्विध्रुवीय हो गया. तृणमूल कांग्रेस ने 213 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल की और उसका वोट शेयर और बढ़ कर लगभग 48 प्रतिशत तक पहुंच गया. लेकिन असली राजनीतिक परिवर्तन भाजपा के उभार में दिखा. भाजपा ने 77 सीटें जीत लीं और उसका वोट शेयर लगभग 38 प्रतिशत तक पहुंच गया. वामदल और कांग्रेस लगभग शून्य पर सिमट गए. यह बदलाव बताता है कि बंगाल की राजनीति अब त्रिकोणीय नहीं, बल्कि लगभग सीधे मुकाबले में बदल चुकी है.
इन आंकड़ों के भीतर एक गहरी राजनीतिक कहानी छिपी है. तृणमूल ने ग्रामीण बंगाल, महिलाओं और मुसलमानों के बीच अपनी सामाजिक योजनाओं और क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति के सहारे मजबूत आधार तैयार किया. ‘बंगाल की बेटी’ की छवि ने 2021 में ममता बनर्जी को व्यक्तिगत स्तर पर भी बड़ा समर्थन दिलाया. दूसरी ओर भाजपा ने 2016 से 2021 के बीच जिस तेजी से वोट प्रतिशत बढ़ाया, वह महज संगठन विस्तार का परिणाम नहीं था. बल्कि हिंदुत्व की वैचारिक अपील, केंद्रीय नेतृत्व की आक्रामक चुनावी रणनीति और वाम-कांग्रेस के क्षरण से पैदा हुए राजनीतिक शून्य का भी परिणाम था.
अब 2026 के चुनाव की पृष्ठभूमि अलग है. भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या वह केवल केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे चुनाव लड़ेगी या राज्य में कोई ऐसा चेहरा उभारेगी जो स्थानीय स्तर पर भरोसे का विकल्प बन सके? 2021 में चुनावी प्रचार भले ही बड़े पैमाने पर मोदी के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा हो, लेकिन बंगाल के मतदाताओं ने आखिरकार स्थानीय नेतृत्व को प्राथमिकता दी. यही कारण है कि तृणमूल कांग्रेस इस बार भी चुनावी विमर्श को “दीदी बनाम मोदी” तक सीमित रखना चाहती है, क्योंकि यह फ्रेम उसे सीधी टक्कर में भावनात्मक बढ़त देता है. यदि मुकाबला स्थानीय नेतृत्व बनाम स्थानीय नेतृत्व में बदलता है तो समीकरण भिन्न हो सकते हैं. भाजपा का एक बड़ा सपोर्टर बंगाल में खड़ा हो गया है. बस पार्टी को उसे भरोसा दिलाना होगा कि बंगाल में उसकी सरकार बनेगी और उनकी सुरक्षा की गारंटी होगी. फिर यह सपोर्टर वोटर में तब्दील हो सकता है.
पश्चिम बंगाल के चुनाव में ‘M’ फैक्टर हावी रहता है. यानी चुनाव महिला, मुस्लिम, मंदिर, मस्जिद, मनी पावर, मसल पावर, ममता और मोदी के इर्दगिर्द ही रहता है. इसके समानांतर, मतदाता सूची पुनरीक्षण, सांस्कृतिक पहचान और सीमावर्ती जिलों की सुरक्षा जैसे मुद्दे भी राजनीतिक विमर्श में जगह बना रहे हैं. तृणमूल इन मुद्दों को बंगाली अस्मिता और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के रूप में प्रस्तुत करती है. जबकि भाजपा इसे प्रशासनिक पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ती है. मुस्लिम-बहुल सीटों पर तृणमूल की पकड़ 2021 में बेहद मजबूत रही थी और वही सामाजिक समीकरण 2026 में भी निर्णायक हो सकते हैं. भाजपा इन क्षेत्रों में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन यह आसान नहीं है.
दरअसल, बंगाल का चुनाव केवल आंकड़ों का खेल नहीं है. यह उस राजनीतिक मनोविज्ञान का भी सवाल है जिसमें मतदाता यह तय करता है कि उसे स्थिरता चाहिए या परिवर्तन. तृणमूल के लिए एक बड़ी चुनौती एंटी इन्कंबेंसी की है, जो 15 साल सत्ता में रहने के बाद स्वाभाविक रूप से उभरती है. भाजपा के लिए चुनौती विश्वसनीय विकल्प बनने की है. पिछले तीन चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि भाजपा का विस्तार वास्तविक है. लेकिन सत्ता तक की दूरी अभी भी काफी है. उसे लगभग दस प्रतिशत अतिरिक्त वोट और दर्जनों सीटों का स्विंग चाहिए होगा. और यह बिना मजबूत स्थानीय नेतृत्व और ठोस सामाजिक गठजोड़ के संभव नहीं दिखता.
पश्चिम बंगाल का यह विधानसभा चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय करेगा कि राज्य की राजनीति व्यक्तित्व आधारित द्वंद में सिमटती है या विकास, प्रशासन और सामाजिक संतुलन जैसे ठोस मुद्दों पर आगे बढ़ती है. यदि चुनाव केवल ‘दीदी बनाम मोदी’ बनकर रह गया तो भावनात्मक ध्रुवीकरण हावी रहेगा. यदि यह शासन बनाम विकल्प की बहस में बदला तो परिणाम अलग दिशा ले सकते हैं.
अनिल पांडेय
अनिल पांडेय मीडिया रणनीतिकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। वह जनसत्ता से लेकर स्टार न्यूज और द संडे इंडियन के साथ काम कर चुके हैं। देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक नब्ज को अच्छे से समझने वाले चुनिंदा पत्रकारों में शुमार हैं।


