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खंडवा न्यूजः राजेंद्र कहते है अगर गांव की मिट्टी में लगन हो तो खिलाड़ी कहीं भी पहुंच सकता है. जरूरत है मेहनत, अनुशासन और सही मार्गदर्शन की. आज वे पुलिस की वर्दी में कानून की रक्षा कर रहे है और अखाड़े में अगली पीढ़ी को तैयार कर रहे है. गांव की जमीन से उठकर नेशनल खिलाड़ी बनने और पुलिस विभाग में नौकरी पाने तक का यह सफर बताता है कि जुनून हो तो रास्ते खुद बन जाते है.
खंडवा के छोटे से गांव बोरगांव खुर्द के मिट्टी में पले-बढ़े एक लड़के ने अखाड़े की कुश्ती से ऐसा नाम कमाया कि नेशनल स्तर तक पहुंच गया और इसी खेल ने उसे पुलिस विभाग में नौकरी भी दिलाई. यह कहानी है खंडवा पुलिस में पदस्थ राजेंद्र पंजारे की. जिनका जीवन आज भी युवाओं के लिए मिसाल बना हुआ है. राजेंद्र पंजारे का परिवार कुश्ती की परंपरा से जुड़ा रहा है. उनके पिता रघुनाथ पंजारे जिला कुश्ती संगठन में सचिव थे और गांव के बच्चों को खुद कसरत करवाते थे. अब तीसरी पीढ़ी भी पहलवानी में जुट चुकी है. राजेंद्र के बेटे भी अखाड़े में पसीना बहा रहे है.
Local 18 से बातचीत में राजेंद्र बताते है कि उन्होंने साल 1992 में कुश्ती की शुरुआत की. उस समय गांव में बाकायदा अखाड़ा भी नहीं था. स्कूल के पास मिट्टी डलवाकर वहीं दांव-पेंच सीखे जाते थे. लंगोट सिलवाकर गांव की मिट्टी में अभ्यास शुरू हुआ और फिर सफर आगे बढ़ता गया. 1993 के आसपास खंडवा के लक्कड़ बाजार में एक बड़ा दंगल हुआ, जिसमें महाबली सतपाल पहलवान जैसे दिग्गज पहुंचे. बच्चों की कुश्ती देखकर उन्होंने कहा कि खंडवा में प्रतिभा है.
यहां से भी बच्चों को दिल्ली भेजना चाहिए. बस यहीं से राजेंद्र का रास्ता दिल्ली की ओर खुल गया. कम उम्र में वे दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम पहुंचे. वहां की जिंदगी आसान नहीं थी. मेस की सुविधा नहीं थी, खुद खाना बनाते थे, खुद मेहनत करते थे. करीब सात साल तक उन्होंने वहीं रहकर तैयारी की. उसी दौरान वे देश के नामी पहलवान सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त जैसे खिलाड़ियों के साथ एक ही बैरक और कमरे में रहे. साथ अभ्यास किया साथ संघर्ष किया.
1996 में आंध्र प्रदेश के नलगोंडा में 38 किलो वर्ग में उन्होंने मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया. उसी प्रतियोगिता में सुशील कुमार दिल्ली की ओर से खेल रहे थे. एक मुकाबले में सुशील कुमार को यूपी के पहलवान नागेंद्र कुमार ने हरा दिया. बाद में जब राजेंद्र का मुकाबला नागेंद्र से हुआ तो उन्होंने उसे मात दी. इस जीत से सुशील कुमार बेहद खुश हुए. राजेंद्र बताते हैं कि इतने बड़े मुकाम पर पहुंचने के बाद भी सुशील कुमार आज तक उस घटना को याद रखते है.
राजेंद्र ने गांधीनगर (गुजरात) सहित कई प्रतियोगिताओं में गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल जीते. 2002 में उनकी नौकरी पुलिस विभाग में लगी और 2005 में उन्होंने जॉइनिंग की. पहला थाना मोघट मिला. आज भी वे खंडवा में पदस्थ है और नौकरी के साथ-साथ इनडोर स्टेडियम में बच्चों को कुश्ती सिखाते है. वे बताते है कि कई बच्चों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती तो समाजसेवियों की मदद से उनके लिए डाइट की व्यवस्था भी करवाई जाती है. उनका मानना है कि खंडवा और निमाड़ में कुश्ती की बड़ी परंपरा है. सोनखेड़ी के कृपाशंकर पटेल (अर्जुन अवॉर्डी), रोहित पटेल, राजकुमार पटेल, अरविंद पटेल और उमेश पटेल जैसे पहलवानों ने भी नाम कमाया है. बोरगांव की माधुरी पटेल और नीरज पटेल जैसे खिलाड़ी इंटरनेशनल स्तर तक पहुंचे है.
राजेंद्र कहते है अगर गांव की मिट्टी में लगन हो तो खिलाड़ी कहीं भी पहुंच सकता है. जरूरत है मेहनत, अनुशासन और सही मार्गदर्शन की. आज वे पुलिस की वर्दी में कानून की रक्षा कर रहे है और अखाड़े में अगली पीढ़ी को तैयार कर रहे है. गांव की जमीन से उठकर नेशनल खिलाड़ी बनने और पुलिस विभाग में नौकरी पाने तक का यह सफर बताता है कि जुनून हो तो रास्ते खुद बन जाते है.


