भारत की स्पेस इकॉनमी 8.4 अरब डॉलर, ISRO की वैश्विक सफलता

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नई दिल्ली. भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था लगातार नई ऊंचाइयों को छू रही है. केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह (Dr Jitendra Singh) ने 29 जनवरी 2026 को राज्यसभा में जानकारी दी कि देश की स्पेस इकॉनमी का आकार अब 8.4 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. इसके साथ ही पूरे वैल्यू चेन में 399 सक्रिय स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं, जो इस सेक्टर में बड़े बदलाव का संकेत है. यह आंकड़ा 2019 से पहले की स्थिति से बिल्कुल अलग है, जब स्पेस सेक्टर में गिने चुने स्टार्टअप ही मौजूद थे. निजी भागीदारी के लिए सेक्टर खोलने और इन स्पेस की स्थापना के बाद भारत का अंतरिक्ष उद्योग सरकारी मॉडल से निकलकर हाइब्रिड मॉडल की ओर बढ़ गया है.

2019 में किए गए नीतिगत सुधारों के बाद निजी कंपनियों को इसरो (ISRO) के साथ काम करने और स्वतंत्र रूप से प्रोजेक्ट्स शुरू करने का मौका मिला. इन स्पेस को सिंगल विंडो एजेंसी के तौर पर बनाया गया, जिससे निजी कंपनियों को मंजूरी, सहयोग और इंफ्रास्ट्रक्चर तक आसान पहुंच मिल सकी.

स्टार्टअप्स की तेजी से बढ़ती संख्या

सरकार के मुताबिक देश में फिलहाल 399 स्पेस टेक स्टार्टअप्स सक्रिय हैं. ये कंपनियां लॉन्च व्हीकल, सैटेलाइट निर्माण, प्रोपल्शन सिस्टम, स्पेस ग्रेड इलेक्ट्रॉनिक्स, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, अर्थ ऑब्जर्वेशन और डाउनस्ट्रीम एप्लिकेशन जैसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं. कुछ रिपोर्ट्स में यह संख्या 420 से अधिक भी बताई जा रही है.

विदेशी सैटेलाइट लॉन्च से कमाई

भारत ने अब तक 434 विदेशी सैटेलाइट लॉन्च किए हैं, जिनमें से 399 लॉन्च 2014 के बाद हुए हैं. इन लॉन्च से इसरो को करीब 600 से 650 मिलियन डॉलर के बराबर विदेशी मुद्रा आय हुई है, जिससे भारत की ग्लोबल कमर्शियल लॉन्च मार्केट में पकड़ मजबूत हुई है.

बजट में स्पेस सेक्टर पर जोर

वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में अंतरिक्ष विभाग को 13,705.63 करोड़ रुपये का आवंटन मिला है. इसमें से करीब 46 प्रतिशत हिस्सा कैपेक्स पर खर्च किया जाएगा, जिसमें लॉन्च व्हीकल, सैटेलाइट, गगनयान मिशन, नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल और निजी कंपनियों को सुविधा देना शामिल है.

रोजगार और आर्थिक असर

एक अध्ययन के मुताबिक स्पेस सेक्टर से करीब 96,000 प्रत्यक्ष और 47 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए हैं. इस सेक्टर की उत्पादकता सामान्य उद्योगों की तुलना में ढाई गुना ज्यादा मानी जाती है और हर एक डॉलर की कमाई से 2.54 डॉलर का मल्टीप्लायर इफेक्ट बनता है.

आने वाले वर्षों का लक्ष्य

इन स्पेस के विजन के अनुसार भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था अगले 8 से 10 वर्षों में 4 से 5 गुना बढ़कर 40 से 45 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है. सरकार का लक्ष्य 2033 तक 11 अरब डॉलर के स्पेस एक्सपोर्ट और वैश्विक स्पेस इकॉनमी में 8 से 10 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करना है.

निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका

स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace), अग्निकुल कॉसमॉस (Agnikul Cosmos), पिक्सल (Pixxel), ध्रुवा स्पेस (Dhruva Space) और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस (Bellatrix Aerospace) जैसी कंपनियां भारत के स्पेस स्टार्टअप इकोसिस्टम को नई पहचान दे रही हैं. सरकार का मानना है कि भारत का स्पेस सेक्टर विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में एक बड़ा आर्थिक इंजन साबित होगा और आने वाले वर्षों में मैन्युफैक्चरिंग, इनोवेशन और एक्सपोर्ट को नई दिशा देगा.



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