महराजगंज में सड़क किनारे झोपड़ी में फंसी रमेश परिवार की दर्दभरी ज़िंदगी, भूख और मुश्किलों से जूझते बच्चे!

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महराजगंज जिले के सिसवा-निचलौल सड़क के किनारे एक छोटी सी झोपड़ी में रह रहे रमेश और उनके परिवार की जिंदगी दर्द और संघर्षों से भरी हुई है. 35 सालों से सड़क के किनारे झुग्गी में रहने वाले इस परिवार का रोज़ाना जीवन तेज़ रफ्तार गाड़ियों की आवाज़ के बीच संघर्षों से गुजरता है. रमेश पत्थर पर कारीगरी कर सिलबट्टा बनाते हैं, जबकि उनकी पत्नी और बच्चे आसपास के गांवों में मजदूरी करते हैं. इस परिवार की स्थिति इतनी दयनीय है कि उनका जीवन बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष कर रहा है.

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महराजगंज. उत्तर प्रदेश का महराजगंज जिला पिछड़ा जिला माना जाता है. जिले के अलग-अलग हिस्सों में कई ऐसे जगह आपको मिलेंगे जहां लोग सड़क के किनारे झुग्गी झोपड़ी डालकर रहते हैं. महराजगंज जिले के सिसवा से निचलौल जाने वाली सड़क के किनारे एक ऐसी तस्वीर दिखाई देती है. सिसवा से थोड़ी ही दूरी उत्तर दिशा में जाने पर सड़क के दाई ओर एक झोपड़ी दिखती है. यह झोपड़ी है रमेश के परिवार की है जहां वह सड़क के किनारे एक झोपड़ी बनाकर अपना जीवन गुजारने पर मजबूर है. रोड के किनारे और खुले आसमान के नीचे होने की वजह से सड़क पर गुजरने वाली तेज रफ्तार की गाड़ियों की आवाजाही के बीच रहना उनके परिवार की रोजमर्रा का सच्चाई बन चुका है. रमेश पत्थर पर कारीगरी कर सिलबट्टा बनाते हैं जो ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में मसाले और अन्य दूसरे चीज पीसने के लिए प्रयोग किए जाते हैं. इसके अलावा घर के दूसरे सदस्य ईट के भट्टों पर काम करते हैं.

परिवार की महिलाएं भी गांव में जाकर करती हैं मजदूरी
सड़क के किनारे मौजूद देश झोपड़ी में रहने वाले परिवार के मुखिया रमेश ने लोकल 18 से बातचीत के दौरान बताया कि बीते 35 सालों सेवा इस सड़क के किनारे झोपड़ी डालकर रह रहे हैं. इसके अलावा उनके परिवार की महिलाएं स्थानीय क्षेत्र के गांव में जाकर काम करती हैं और वहां से जो चावल आटा या पैसा मिलता है वह लेकर आती हैं. उन्होंने बताया कि उनके घर के बच्चे इस क्षेत्र में संचालित एट के भक्तों पर मजदूरी करते हैं और उन्हें कुछ पैसा मिल जाता है और उसी से इनका जीवन चलता है. इस परिवार की स्थिति इतनी दयनीय है की बहुत कठिन परिस्थिति में परिवार के लोगों का राशन पानी चल रहा है. रमेश की झोपड़ी में प्रवेश करते ही घरेलू सामान के नाम पर एक चौकी, एक पुरानी और टूटी हुई अलमारी, एक मिट्टी का चूल्हा और देवी देवता का कुछ फोटो मिलता है. इस परिवार के लिए यही इनका घर है और इन्हीं सीमित वस्तुओं में इन्हें अपना जीवन गुजारना होता है.

बच्चे ने बताई अपनी दर्द भरी कहानी
रमेश ने बताया कि उनके घर में बिस्तर भी एक ही दो है जिन्हें उनके बच्चे ईंट के भट्टों पर जब काम करने जाते हैं तो वहां लेकर चले जाते हैं. जब काम से वापस लौटते हैं तो वही बिस्तर इस झोपड़ी में लेकर आते हैं और फिर परिवार के लोग यहां सोते हैं. परिवार में कम उम्र के एक बच्चे ने बताया कि उसे याद भी नहीं है कि कब उसने अच्छा खाना खाया था और सुबह में उसने चोखा और चावल खाया था. इसके साथ ही पूछने पर उसने बताया कि पैसा ना होने की वजह से वह पढ़ाई भी नहीं कर पाता है. रमेश ने बताया कि आज के समय में मसाले पीसने के लिए मशीन भी आ गई है, जिसकी वजह से उनके सिलबट्टा के काम में भी काफी दिक्कत होती है और इसकी मांग भी काम हो चुकी है, जिसका असर उनके परिवार पर भी पड़ता है.

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Monali Paul

Hello I am Monali, born and brought up in Jaipur. Working in media industry from last 9 years as an News presenter cum news editor. Came so far worked with media houses like First India News, Etv Bharat and NEW…और पढ़ें



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