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Vande Mataram News: देश में इन दिनों वंदे मातरम् को लेकर काफी कोलाहल है. अब कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इसपर अपनी राय रखी है. साथ ही इसको लेकर समाधान भी बताया है. उनका कहना है कि भारत का राष्ट्रवाद ऐसा हो, जिसमें सभी के लिए जगह होनी चाहिए.
Vande Mataram News: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने वंदे मातरम् गाने पर बड़ी बात कही है. (फाइल फोटो/PTI)
Vande Mataram News: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने वंदे मातरम् को लेकर चल रही बहस पर अपनी राय रखते हुए कहा है कि राष्ट्रवाद को समावेशी होना चाहिए और किसी नागरिक को देशभक्ति के प्रदर्शन के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि भारत का राष्ट्रवाद ऐसा होना चाहिए, जिसमें आस्तिक, असहमत और मौन रहने वाले सभी नागरिकों के लिए समान स्थान हो. थरूर कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ का ऐतिहासिक सफर भारतीय पहचान की जटिलताओं को दर्शाता है. महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशभक्ति का प्रमुख प्रतीक बना और क्रांतिकारियों तथा सत्याग्रहियों को प्रेरित करता रहा. हालांकि, आधुनिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में इस गीत को लेकर उभरे विवाद राज्य के प्रतीकों और व्यक्तिगत अंतरात्मा के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं.
कांग्रेस सांसद शिश थरूर ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ समाचारपत्र में लिखे लेख में बताया कि स्वतंत्रता से पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ को देशभक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में गाया जाता था. लेकिन आजादी के समय देश की धार्मिक विविधता को ध्यान में रखते हुए ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया. यह निर्णय राष्ट्रवादी इतिहास का सम्मान करने और धार्मिक संवेदनशीलताओं के बीच संतुलन बनाने के उद्देश्य से लिया गया था. थरूर ने इस संदर्भ में नोबेल पुरस्कार विजेता रबिंद्रनाथ टैगोर की भूमिका का भी उल्लेख किया. टैगोर ने 1937 में सुझाव दिया था कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो छंद ही गाए जाएं. उनका मानना था कि शुरुआती छंद मातृभूमि के प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीकात्मक वर्णन करते हैं, जबकि बाद के छंदों में देवी-देवताओं का उल्लेख है, जिससे कुछ धार्मिक समुदायों को आपत्ति हो सकती है.
मुसलमानों को आपत्ति क्यों?
थरूर के अनुसार, कई मुस्लिम समुदायों की आपत्ति का मूल कारण इस्लाम का ‘तौहीद’ सिद्धांत है, जो ईश्वर की एकता पर बल देता है और किसी अन्य सत्ता की पूजा को स्वीकार नहीं करता. ऐसे में गीत के कुछ अंश उनके धार्मिक विश्वासों से टकराते हैं. उन्होंने कहा कि किसी नागरिक को ऐसी स्थिति में डालना, जहां उसे आस्था और राज्य के बीच चयन करना पड़े, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की भावना के विपरीत है. लेख में उन्होंने यह भी तर्क दिया कि देशभक्ति एक स्वाभाविक भावना है, जिसे कानून के माध्यम से थोपना संभव नहीं. उनके अनुसार, किसी राष्ट्रीय प्रतीक की शक्ति स्वैच्छिक सम्मान में निहित होती है, न कि बाध्यकारी आदेश में. यदि राज्य नागरिकों से जबरन निष्ठा का प्रदर्शन करवाता है, तो इससे वास्तविक देशभक्ति कमजोर हो सकती है.
तो फिर क्या किया जाए?
अब सवाल उठता है कि आगे क्या समाधान है? शशि थरूर ने इस विवाद के समाधान के लिए 1986 के एक ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहने वाले नागरिक को उसे गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. उन्होंने सुझाव दिया कि इसी सिद्धांत को ‘वंदे मातरम्’ के मामले में भी लागू किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि जो लोग गीत के सभी छंद गाना चाहते हैं, उन्हें इसकी स्वतंत्रता होनी चाहिए, वहीं धार्मिक या वैचारिक आधार पर आपत्ति रखने वालों को सम्मानपूर्वक मौन रहने का अधिकार मिलना चाहिए. साथ ही राज्य को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी नागरिक को इस अधिकार के प्रयोग के कारण दंड या सामाजिक भेदभाव का सामना न करना पड़े.
सह-अस्तित्व की बात
थरूर ने निष्कर्ष में कहा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र में एकता का आधार बाध्यता नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और आपसी सम्मान है. उनके अनुसार, राष्ट्रवाद का सही स्वरूप वही है जो हर नागरिक को अपनी आस्था और अंतरात्मा के अनुरूप देश के प्रति सम्मान व्यक्त करने की स्वतंत्रता देता है.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें


