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दुनिया में एक ऐसी चिड़िया भी है जो बिना रुके 8000 मील (करीब 12,800 किलोमीटर) से अधिक की दूरी तय करती है. उसका नाम ‘बार-टेल्ड गॉडविट’ है. वो कई दिनों तक उड़ती रहती है, थकती नहीं. कुछ खाती -पीती भी नहीं. हिंदी में इसे ‘चहला’ या ‘वनचहला’ भी कहा जाता है. इसका रोमांस का तरीका भी अनोखा होता है. इसे दुनिया का सबसे बड़ा घुमक्कड़ पक्षी भी कहा जाता है.
2022 में एक युवा गॉडविटस, जिसे वैज्ञानिकों ने ‘B6’ नाम दिया, उसने अलास्का से ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया तक 13,560 किलोमीटर (करीब 8,425 मील) की दूरी बिना रुके 11 दिन और 1 घंटे में पूरी की यानि 11 दिनों तक वो लगातार उड़ती रही. ना तो कुछ खाया ना पानी पिया और ना ही आराम किया. है ना हैरानी की बात.
ये पक्षी बिना खाए पिये इतने दिनों तक उड़ते हुए इतना लंबा सफर कैसे तय कर पाता है, ये भी वैज्ञानिकों के लिए किसी रहस्य से कम नहीं है. हालांकि इसके पीछे इस पक्षी की अपनी कुछ विशेष शारीरिक क्षमताएं हैं. उड़ान भरने से पहले ये पक्षी अपने शरीर के उन अंगों को सिकोड़ लेते हैं जिनकी उड़ान के दौरान ज़रूरत नहीं होती, जैसे कि पेट और लीवर. इससे उनका वजन कम हो जाता है और ऊर्जा बचती है.
यात्रा से पहले ये पक्षी खूब खाते हैं ताकि उनके शरीर में चर्बी जमा हो सके. उड़ान के दौरान यही चर्बी जलकर उन्हें ऊर्जा और पानी दोनों देती है. ऐसा माना जाता है कि ये पक्षी उड़ते समय अपने दिमाग के एक हिस्से को सुला देते हैं और दूसरे हिस्से से रास्ता देखते हैं. इससे वे बिना रुके अपनी थकान मिटा पाते हैं.
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लंबी यात्रा पर निकलने से पहले ये पक्षी अलास्का के तटों पर कीड़े, घोंघे और समुद्री कीड़े पागलों की तरह खाते हैं, जिससे वजन दोगुना कर सकें. जब ये पक्षी उड़ान भरते हैं, तो इनका शरीर एक विशेष मोड में चला जाता है. पाचन तंत्र सिकुड़कर आधे से भी कम हो जाते हैं ताकि वजन कम रहे. दिल का आकार बढ़ जाता है ताकि पंखों तक ज्यादा ऑक्सीजन और खून पंप हो सके. फेफड़े बहुत कुशलता से हवा से ऑक्सीजन खींचते हैं, जिससे वे ऊंचाई पर भी उड़ पाते हैं.
इनका वजन करीब 250 से 450 ग्राम होता है जो उड़ान से दोगुना हो जाता है. ये आमतौर पर अलास्का और साइबेरिया जाकर प्रजनन करते हैं. सर्दियों में न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में रहते हैं. ये जब उड़ते हैं तो इनकी गति 50-60 किलोमीटर प्रति घंटा होती है. इनका शरीर इस कदर ‘एयरोडायनामिक’ होता है, जो हवा को चीरते हुए तेजी से आगे बढ़ने में मदद करता है. बिना किसी नक्शे या जीपीएस के ये पक्षी हज़ारों मील का रास्ता कैसे तय करते हैं, ये भी शोध का विषय है. माना जाता है कि वे पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को महसूस कर सकते हैं. सूरज और तारों की स्थिति का उपयोग करते हैं. हवा के दबाव और गंध की पहचान करने में भी माहिर होते हैं.
चूंकि ये उड़ते समय अपने पंखों को लगातार फड़फड़ाते रहते हैं, लिहाजा उनके सीने की मांसपेशियां अविश्वसनीय रूप से मजबूत होती हैं. उनकी ऊर्जा दक्षता एक जेट इंजन से भी बेहतर मानी जाती है, क्योंकि ये बहुत कम ईंधन में हज़ारों मील की दूरी तय कर लेता है. जब बार-टेल्ड गॉडविट 8000 मील की यात्रा के बाद अपनी मंजिल पर पहुंचता है तो बिल्कुल हड्डियों का ढांचा रह जाता है. इसकी सारी चर्बी खत्म हो चुकी होती है. इसके सिकुड़े हुए आंतरिक अंग वापस सामान्य आकार में आने में कुछ दिन लेते हैं. इसके बाद यह फिर से खाना शुरू करता है ताकि अगली यात्रा के लिए तैयार हो सके.
यह पक्षी किसी एक जगह का स्थायी निवासी नहीं है; इसका पूरा जीवन एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप के बीच दौड़ते हुए बीतता है यह दुनिया के सबसे बड़े “घुमक्कड़” पक्षियों में से एक है. साइबेरिया के आर्कटिक क्षेत्रों में भी इनकी बड़ी आबादी रहती है. क्योंकि यहां की गर्मियों में कीड़े-मकोड़ों की भरमार होती है, जो इनके बच्चों के लिए बेहतरीन भोजन है.
सितंबर से मार्च तक ये न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में वहां के रेतीले तटों और कीचड़ वाले मैदानों में रहते हैं. इनकी कुछ उप-प्रजातियां अफ्रीका के तटों, भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और यूरोप के समुद्री किनारों पर भी पाई जाती हैं. भारत में भी ‘बार-टेल्ड गॉडविट’ सर्दियों के दौरान देखे जाते हैं. तब ये गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में दिखते हैं. ओडिशा की चिल्का में हजारों प्रवासी पक्षी आते हैं. तमिलनाडु में भी पुलिकट लेक में सर्दियों में इनकी मौजूदगी दर्ज की जाती है.
पक्षी जगत में बार-टेल्ड गॉडविट को एक “वफादार” और अनुशासित” साथी माना जाता है. ये पक्षी आमतौर पर ‘मोनोगेमस’ होते हैं. मतलब ये है कि एक प्रजनन सीजन के दौरान वो एक ही मादा के साथ रिश्ता रखते हैं.कई मामलों में देखा गया है कि ये जोड़े कई सालों तक एक-दूसरे के साथ बने रहते हैं. नर गॉडविट मादा को प्रभावित करने के लिए काफी मेहनत करता है. नर पक्षी हवा में ऊंची उड़ान भरता है. विशेष प्रकार की आवाज़ें निकालते हुए कलाबाजियां दिखाता है. यह मादा को यह बताने का तरीका है कि वह कितना स्वस्थ और ताकतवर है.
इनका प्यार बच्चों के प्रति भी अद्भुत है. बारी बारी से नर और मादा दोनों अंडा सेते हैं. जैसे ही बच्चे अंडे से बाहर निकलते हैं, वे खुद अपना खाना ढूंढने लगते हैं. जैसे ही बच्चे थोड़े बड़े होते हैं, माता-पिता उन्हें छोड़कर अपनी लंबी यात्रा पर निकल जाते हैं. बच्चे अपने आप बिना किसी गाइड के हज़ारों मील का रास्ता ढूंढकर अपने माता-पिता के पास पहुंचते हैं.


