सीतामढ़ी : बिहार में सीतामढ़ी जिले के डुमरा प्रखंड में एक गांव पररी है. यहां गांव के रहने वाले किसान कौशल किशोर यादव आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. जहां एक ओर आधुनिक खेती में रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता नष्ट हो रही है. वहीं, 56 वर्षीय कौशल किशोर ने जैविक खेती को अपनाकर न केवल अपनी किस्मत बदली है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे रहे हैं.
बेटा बैंक में तो बेटी है शिक्षिका
किसान कौशल किशोर यादव पिछले 40 सालों से खेती कर रहे हैं. इसकी वजह से वह आज एक ‘मास्टर ट्रेनर’ के रूप में अन्य किसानों को भी प्रशिक्षित कर रहे हैं, जिसके लिए उन्हें मानदेय और भत्ता भी मिलता है. उनकी सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी खेती की कमाई से ही अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई, जिनमें एक बेटा बैंक में है, दूसरा व्यवसाय में और बेटी शिक्षिका है.
2 एकड़ में करते हैं गन्ने की खेती
किसान कौशल ने बताया कि वह लगभग 18 से 20 एकड़ की भूमि पर एकीकृत खेती कर रहे हैं. उनका खेत विविधता का अनूठा उदाहरण है. उन्होंने 50 डिसमिल क्षेत्र में आम, लीची, अमरूद और आंवला जैसे फलों की बागवानी कर रखी है. इसके अलावा, एक एकड़ में मत्स्य पालन और वर्तमान में 2 एकड़ में गन्ने की खेती कर रहे हैं.
किसान ने बताया कि गन्ना मिल दोबारा चालू होने के कारण वह अब अपना ध्यान धान-गेहूं से हटाकर वापस ईख की खेती पर केंद्रित कर रहे हैं. पहले वह 10 एकड़ में गन्ने की करते थे. इसके अतिरिक्त वह 60 डिसमिल में मौसमी हरी सब्जियां जैसे धनिया, आलू, पालक, गोभी, सेम और टमाटर उगाते हैं, जबकि डेढ़ एकड़ में तिलहन और 2 एकड़ में दलहन की खेती प्रमुखता से की जाती है.
जैविक खाद का स्वयं करते हैं निर्माण
किसान कौशल की सफलता का सबसे बड़ा राज स्व-निर्मित जैविक खाद है. वह बाजार के रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय खुद प्राकृतिक खादों का निर्माण करते हैं और गौ-पालन के जरिए खाद की आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं. परंपरागत खेती को आधुनिकता से जोड़ते हुए उनके पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है. वर्ष 1986 में उन्होंने अपना पहला ट्रैक्टर खरीदा था. हालांकि आज उनके पास 3 ट्रैक्टर, 2 ट्राली, रोटावेटर, कल्टीवेटर और थ्रेसर जैसी तमाम आधुनिक मशीनें मौजूद हैं. उन्होंने सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत 10 लाख रुपये से अधिक की सब्सिडी का लाभ उठाकर अपने कृषि ढांचे को मजबूत किया है. उनके खेतों में नियमित रूप से 4-5 मजदूर काम करते रहते हैं.
राष्ट्रीय स्तर पर मिला है सम्मान
किसान कौशल किशोर यादव की उत्कृष्ट कार्यप्रणाली को न केवल बिहार, बल्कि अन्य राज्यों के विश्वविद्यालयों ने भी सराहा है. वर्ष 2021 में समस्तीपुर यूनिवर्सिटी द्वारा उन्हें ‘वेस्ट डी-कंपोजर’ से सफल खेती करने के लिए सर्टिफिकेट और मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया था. उनकी ख्याति यहीं नहीं रुकी, रांची यूनिवर्सिटी और पंतनगर विश्वविद्यालय ने भी उन्हें जैविक खेती के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया है. यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि यदि सही तकनीक और समर्पण के साथ काम किया जाए तो खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि सम्मान और समृद्धि का मार्ग बन सकती है.
आर्थिक स्थिरता और भविष्य की योजनाएं
खेती में जोखिमों, जैसे प्राकृतिक आपदाओं और मौसम की अनिश्चितता के बावजूद, कौशल किशोर यादव सालाना 12 से 15 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा रहे हैं. उनका मानना है कि धान और गेहूं की तुलना में गन्ने की खेती अधिक लाभदायक है. जैसे-जैसे वे ईख की खेती का रकबा बढ़ाएंगे, उनका मुनाफा और बढ़ने की उम्मीद है. मिश्रित खेती (मछली पालन, पशुपालन, बागवानी और अनाज) ने उन्हें एक ऐसी आर्थिक सुरक्षा प्रदान की है, जो आज के समय में मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक मिसाल है.उनकी आत्मनिर्भरता और दृढ़ निश्चय ने उन्हें सीतामढ़ी का एक ‘प्रगतिशील किसान’ बना दिया है.
जैविक अपनाएं, जीवन बचाएं
तमाम किसानों को संदेश देते हुए कौशल किशोर यादव कहते हैं कि हमें ऐसी खेती करनी चाहिए जो हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ जमीन और स्वस्थ वातावरण छोड़कर जाए. वह किसानों से आग्रह करते हैं कि भले ही पूरे खेत में न सही, लेकिन कम से कम अपनी ‘बारी’ (घर के आसपास की भूमि) में अपने परिवार के खाने के लिए जैविक सब्जियां जरूर उगाएं. उनका तर्क है कि रासायनिक खेती के घातक परिणामों से बचने के लिए जैविक की ओर लौटना अनिवार्य है। उनका जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि “जमीन से जुड़कर और प्रकृति का सम्मान कर न केवल धन कमाया जा सकता है, बल्कि समाज को स्वस्थ रहने की नई राह भी दिखाई जा सकती है.


