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महज 600 रुपये की मामूली पूंजी से अपना सफर शुरू करने वाली बबीता आज न केवल खुद आत्मनिर्भर हैं. उन्होंने घरेलू चूल्हे-चौके से निकलकर उद्यमिता की दुनिया में कदम रखा और आज उनका सालाना टर्नओवर लाखों में है. बबीता का यह स्टार्टअप अब एक छोटे उद्योग का रूप ले चुका है. उनके इस कारखाने में 3-4 मजदूर नियमित रूप से काम करते हैं, जिन्हें वह प्रति किलो 10 रुपये की मजदूरी देती हैं.
सीतामढ़ी: हौसले बुलंद हो और इरादे नेक, तो इंसान शून्य से शिखर तक का सफर तय कर सकता है. बिहार की बबीता कुमारी ने इस बात को सच कर दिखाया है. साल 2018 में महज 600 रुपये की मामूली पूंजी से अपना सफर शुरू करने वाली बबीता आज न केवल खुद आत्मनिर्भर हैं, बल्कि ‘अगरबत्ती क्वीन’ के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं. उन्होंने घरेलू चूल्हे-चौके से निकलकर उद्यमिता की दुनिया में कदम रखा और आज उनका सालाना टर्नओवर लाखों में है. बबीता की यह कहानी उन तमाम महिलाओं के लिए एक मिसाल है जो आर्थिक तंगी के कारण अपने सपनों को दबा देती है.
बबीता कुमारी के उद्यमी बनने की शुरुआत 2018 में हुई. उन्होंने बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा संचालित ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (R-SETI) और ‘जीविका’ के माध्यम से अगरबत्ती निर्माण का 20-25 दिनों का कड़ा प्रशिक्षण लिया. प्रशिक्षण के बाद सबसे बड़ी चुनौती पूंजी की थी. बबीता बताती हैं कि जब उन्होंने काम शुरू करने की ठानी, तो पास में फूटी कौड़ी नहीं थी. पति राम विनय कुमार ने अपनी बचत से महज 600 रुपये दिए. इन्हीं पैसों से बबीता ने कच्चा माल खरीदा और शुरुआत में अपने हाथों से अगरबत्ती बनाना शुरू किया. दिन भर की मेहनत के बाद भी हाथ से काम करने में मुनाफा कम था, लेकिन बबीता ने हार नहीं मानी.
मशीनीकरण से बदली कारोबार की सूरत
हाथ से अगरबत्ती बनाने की चुनौतियों को देखते हुए बबीता ने व्यवसाय को बढ़ाने का फैसला किया. उन्होंने जीविका समूह से 50,000 रुपये की मदद ली और कुछ अन्य स्रोतों से कर्ज जुटाकर डेढ़ लाख रुपये की अपनी पहली मशीन खरीदी. इसके बाद उनकी मेहनत और लगन को देखते हुए बैंक ऑफ बड़ौदा ने उन्हें 9.50 लाख रुपये का बिजनेस लोन स्वीकृत किया. इस वित्तीय सहायता से उन्होंने तीन और आधुनिक मशीनें लगाईं. आज उनके पास कुल चार मशीनें हैं. इन मशीनों की क्षमता इतनी है कि एक घंटे में लगभग 10 किलो माल तैयार हो जाता है, जिससे प्रतिदिन 40 से 45 किलो अगरबत्ती का उत्पादन हो रहा है.
स्थानीय बाजार में धाक और रोजगार के अवसर
बबीता का यह स्टार्टअप अब एक छोटे उद्योग का रूप ले चुका है. उनके इस कारखाने में 3-4 मजदूर नियमित रूप से काम करते हैं, जिन्हें वह प्रति किलो 10 रुपये की मजदूरी देती हैं. इस तरह उन्होंने आधा दर्जन लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मुहैया कराया है. उनके पति राम विनय कुमार मार्केटिंग और सप्लाई की जिम्मेदारी संभालते हैं. बबीता की बनाई अगरबत्तियों की मांग स्थानीय बाजारों जैसे बैरगनिया और रीगा में काफी अधिक है. वे बिना परफ्यूम वाली अगरबत्ती 75 रुपये और पैकेट बंद (12 पीस का सेट) उत्पाद आकर्षक दरों पर बेचती हैं. पैकिंग के लिए रैपर सीधे पटना से मंगवाए जाते हैं ताकि गुणवत्ता से समझौता न हो.
आत्मनिर्भरता के साथ बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का सपना
आज बबीता कुमारी महीने में 35,000 से 40,000 रुपये तक की शुद्ध कमाई कर रही हैं. यह व्यवसाय न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुधार रहा है, बल्कि उनकी बेटियों के भविष्य को भी संवार रहा है. बबीता गर्व से बताती हैं कि उनकी बड़ी बेटी बीए में है और देश की सबसे कठिन परीक्षा यूपीएससी (UPSC) की तैयारी कर रही है, वहीं छोटी बेटी नौवीं कक्षा में पढ़ रही है. 600 रुपये से शुरू हुआ यह सफर आज लाखों के टर्नओवर तक पहुंच गया है. बबीता का कहना है कि अगर महिलाएं ठान लें, तो वे किसी भी बाधा को पार कर समाज में अपनी एक अलग पहचान बना सकती हैं.
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