4000 साल पहले जब अंग्रेजों को कपड़े पहनने का नहीं था सलीका, तब भी भारत में थी स्‍मार्ट सिटी, ASI ने दिए सबूत

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इतिहास के पन्नों को पलटिए और उस दौर में पहुंचिए जब दुनिया के कई हिस्सों में सभ्यता का सूरज भी नहीं उगा था. आज जब पश्चिमी दुनिया अपनी प्रगति का डंका बजाती है तब ओडिशा की मिट्टी से निकले एक सच ने सबको निशब्द कर दिया है. आज से 4,000 साल पहले जब अंग्रेजों के पुरखों को ठीक से कपड़े पहनने तक का सलीका नहीं था तब भारत के कटक में हमारे पूर्वज एक स्मार्ट सिटी जैसी संगठित ग्रामीण सभ्यता में शान से रह रहे थे. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने कटक के जालारपुर गांव में खुदाई कर मिट्टी की उन परतों को हटाया है जिनके नीचे एक पूरी की पूरी सुव्यवस्थित दुनिया दफन थी. यहां न केवल पक्के इरादों वाले इंसानों के घर थे बल्कि उनके पास अपनी खेती, उन्नत औज़ार और एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था थी, जो उस कालखंड में समूची दुनिया के लिए किसी अजूबे से कम नहीं थी. यह खोज सिर्फ अवशेषों का मिलना नहीं है बल्कि भारत की उस महान विरासत का जीवंत प्रमाण है जो हजारों साल पहले ही विकास के शिखर पर थी.

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने ओडिशा के कटक जिले के भारती हुडा (जालारपुर गांव) में खुदाई के दौरान एक अत्यंत महत्वपूर्ण खोज की है. ASI के अनुसार, यहां लगभग 3,500 से 4,000 साल पुराने एक संगठित ग्रामीण बंदोबस्त (Rural Settlement) के अवशेष मिले हैं. खुदाई में एक सुव्यवस्थित ग्रामीण ढांचे का पता चला है, जिसमें गोलाकार मिट्टी की संरचनाएं, पारंपरिक मिट्टी के बर्तन, पत्थर और हड्डी के औजार और धातु की वस्तुओं के निशान शामिल हैं. यह खोज साबित करती है कि ओडिशा के तटीय क्षेत्र में प्रागैतिहासिक काल के दौरान एक उन्नत समुदाय निवास करता था.

पुरातत्वविदों को खुदाई के दौरान खेती के पुख्ता सबूत भी मिले हैं. मिट्टी की परतों से चावल और मूंग (Green Gram) के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो उस समय की कृषि पद्धतियों को दर्शाते हैं. इसके साथ ही जानवरों और मछलियों की हड्डियों के अवशेषों से संकेत मिलता है कि इस प्राचीन बस्ती की अर्थव्यवस्था खेती, पशुपालन, शिकार और मछली पकड़ने पर आधारित थी. ASI का कहना है कि यह खोज तटीय ओडिशा के प्रारंभिक बसावट तंत्र और तत्कालीन जीवनशैली को समझने के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी.

दिलचस्प बात यह है कि ओडिशा में प्राचीन इतिहास की यह अकेली खोज नहीं है. हाल ही में संबलपुर जिले के रायराखोल में भी मिट्टी के नीचे दबे लगभग 10,000 साल पुराने मानव निवास के संभावित प्रमाण मिले हैं. वहां 42 स्थानों पर प्रागैतिहासिक पत्थर की नक्काशी (Rock Carvings) पाई गई हैं, जिनमें मुख्य रूप से जानवरों और पक्षियों का चित्रण किया गया है. ASI इन प्राचीन Remnants के पीछे की सच्चाई उजागर करने के लिए लगातार सर्वेक्षण कर रहा है. कटक की यह नई खोज ओडिशा को भारत के सबसे प्राचीन और संगठित निवास केंद्रों में से एक के रूप में स्थापित करती है.

सवाल-जवाब
1. प्रश्न: कटक के भारती हुडा में पुरातत्व विभाग को वास्तव में क्या मिला है?
उत्तर: एएसआई को यहाँ करीब 4,000 साल पुरानी एक सुव्यवस्थित और संगठित ग्रामीण बस्ती के अवशेष मिले हैं. इसमें प्राचीन मिट्टी के गोलाकार घर, पत्थर और हड्डियों से बने परिष्कृत औजार और धातु की वस्तुओं के निशान प्राप्त हुए हैं. यह खोज साबित करती है कि हमारे पूर्वज हजारों साल पहले ही सामाजिक रूप से संगठित हो चुके थे.

2. प्रश्न: क्या प्राचीन काल के इन निवासियों के पास कृषि और भोजन का कोई व्यवस्थित ज्ञान था? उत्तर: हां, खुदाई के दौरान कार्बनिक अवशेषों के विश्लेषण से चावल और मूंग की खेती के पुख्ता प्रमाण मिले हैं. इसके साथ ही मछली और जानवरों की हड्डियों के अवशेष यह दर्शाते हैं कि यहाँ के लोग कृषि के साथ-साथ पशुपालन और मछली पकड़ने जैसी गतिविधियों में भी पूरी तरह निपुण और सक्रिय थे.

3. प्रश्न: कटक की इस खोज को ‘स्मार्ट सिटी’ या संगठित बस्ती के रूप में क्यों देखा जा रहा है?
उत्तर: इसे संगठित इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यहाँ घरों की बनावट और रोजमर्रा के औजारों में एक विशेष पद्धति देखी गई है. यह महज खानाबदोश लोगों का ठिकाना नहीं था, बल्कि एक स्थायी निवास तंत्र था जहाँ लोगों के पास अपनी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था और विशिष्ट जीवनशैली मौजूद थी, जो बेहद उन्नत थी.

4. प्रश्न: संबलपुर में मिले 10,000 साल पुराने अवशेष कटक की इस खोज से किस तरह अलग और विशेष हैं?
उत्तर: कटक की खोज एक संगठित कृषि आधारित समाज को दर्शाती है, जबकि संबलपुर के रायराखोल में मिली पत्थर की नक्काशी मानव कला की शुरुआती झलक है. वहाँ मिले जानवरों और पक्षियों के चित्र करीब 10,000 साल पुराने हैं, जो इंसान की शुरुआती रचनात्मकता और जंगलों में उनके निवास की लंबी कहानी बयां करते हैं.

5. प्रश्न: इस पुरातात्विक खोज का भारतीय इतिहास और वैश्विक संदर्भ में क्या विशेष महत्व है?
उत्तर: यह खोज इस दावे को मजबूत करती है कि जब पश्चिमी दुनिया और अंग्रेज सभ्यता की दौड़ में पीछे थे, तब भारत में जीवन स्तर काफी उन्नत था. यह ओडिशा के तटीय क्षेत्रों में प्रारंभिक मानव इतिहास की कड़ियों को जोड़ता है और हमें हमारे पूर्वजों के गौरवशाली और तकनीकी रूप से सक्षम अतीत से रूबरू कराता है.



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