चुनाव जीतने के लिए किए गए ‘मुफ्त’ के वादे कभी-कभी खुद सरकार के ही गले की फांस बन जाते हैं. कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के साथ आजकल कुछ ऐसा ही हो रहा है. विधानसभा चुनाव में जिन 5 ‘गारंटियों’ के दम पर कांग्रेस ने सत्ता की मलाई काटी थी और बंपर जीत हासिल की थी, अब उन्हीं गारंटियों को लेकर पार्टी के दिग्गज नेताओं को बार-बार मीडिया और जनता के सामने सफाई देनी पड़ रही है.
ताजा विवाद राज्य के उपमुख्यमंत्री और संकटमोचक माने जाने वाले डीके शिवकुमार के उस बेबाक बयान से खड़ा हुआ है, जिसने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की भी नींद उड़ा दी है. शिवकुमार ने भरे मंच से खुले तौर पर यह स्वीकार कर लिया कि ये फ्लैगशिप योजनाएं सरकारी खजाने पर एक बड़ा ‘बोझ’ बन गई हैं. हालांकि, अपने बयान से सियासी घमासान मचता देख उन्होंने तुरंत यू-टर्न लिया और डैमेज कंट्रोल में जुट गए.
जुबान फिसली या सच आया बाहर?
कर्नाटक में सरकार बने हुए अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है, लेकिन राज्य के बजट और विकास कार्यों पर इन योजनाओं का वित्तीय दबाव साफ दिखने लगा है. खुद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने हाल ही में अनुमान लगाया था कि इन पांच गारंटियों जैसे मुफ्त बिजली, महिलाओं के लिए मुफ्त बस सफर, नकद सहायता आदि को लागू करने की सालाना लागत 52,000 करोड़ रुपये से अधिक आ रही है.
गारंटी हर किसी के लिए एक बोझ
इसी भारी-भरकम खर्च की सच्चाई को बयां करते हुए डीके शिवकुमार ने कह दिया, गारंटी हर किसी के लिए एक बोझ है, जिसमें सरकार भी शामिल है, लेकिन हम इसे रोकेंगे नहीं. विपक्ष हमेशा से कांग्रेस पर ‘मुफ्त की रेवड़ियां’ बांटकर अर्थव्यवस्था तबाह करने का आरोप लगाता रहा है. ऐसे में डिप्टी सीएम के मुंह से ‘बोझ’ शब्द निकलते ही विपक्ष को बैठे-बिठाए एक बड़ा सियासी हथियार मिल गया.
डैमेज कंट्रोल और सिद्धारमैया की ‘सफाई’
विवाद बढ़ता देख सरकार को तुरंत सफाई देनी पड़ी. शिवकुमार ने अपने बयान को घुमाते हुए स्पष्ट किया कि सरकार इन गारंटियों को वापस लेने या इनकी शर्तों में कोई बदलाव करने की कोई योजना नहीं बना रही है.
मुर्दों के नाम पर बंट रही ‘गारंटी’
शिवकुमार ने स्पष्ट किया कि मीडिया उनके ‘बोझ’ वाले बयान की गलत व्याख्या कर रहा है. दरअसल, सरकार की असली टेंशन इन योजनाओं में हो रही धांधली और सिस्टम का लीकेज है. सरकार को लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही हैं कि मरे हुए लोगों के नाम पर भी इन योजनाओं का अनुचित लाभ उठाया जा रहा है. शिवकुमार ने कहा, कई परिवार उन बुजुर्ग सदस्यों के नाम पर अब भी चावल और अन्य राशन उठा रहे हैं, जिनका निधन हो चुका है. नकद आर्थिक सहायता भी ऐसे लाभार्थियों के बैंक खातों में जा रही है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं.
डिप्टी सीएम ने कड़े शब्दों में कहा, हम योजनाओं को संशोधित नहीं करना चाहते हैं, लेकिन मरे हुए लोगों के नाम पर लाभ लिया जा रहा है. हम इस सिस्टम को ठीक करके जवाबदेही तय करने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि पैसा केवल पात्र और जीवित लोगों तक ही पहुंचे.
ढाई साल से जा रहा था पैसा
सरकार की फजीहत यहीं खत्म नहीं होती. गारंटी कार्यान्वयन समिति के अध्यक्ष एचएम रेवन्ना ने खुलासा किया कि इन खामियों की पहचान करने के लिए एक व्यापक सर्वे किया गया है.चूंकि ये योजनाएं पूरी तरह से ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ प्रणाली पर निर्भर हैं, इसलिए लाभार्थियों की मौत का रियल-टाइम डेटा अपडेट न होने के कारण बड़ी चूक हुई. रेवन्ना ने माना कि करीब ढाई साल तक बिना किसी की पकड़ में आए मृतकों के बैंक खातों में पैसा जाता रहा.


