केरल के आलप्पुझा वंदनम मेडिकल कॉलेज में सर्जरी के दौरान मरीज के पेट में सर्जिकल उपकरण छूट जाने के मामले में वरिष्ठ डॉक्टर डॉ. ललितांबिका ने खुद को पूरी तरह निर्दोष बताया है. उन्होंने साफ कहा है कि संबंधित सर्जरी उन्होंने नहीं की थी और इस मामले में उनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है.
मीडिया से बातचीत में डॉ. ललितांबिका ने कहा कि वह यह बात 100 प्रतिशत विश्वास के साथ कह सकती हैं कि उस ऑपरेशन में उन्होंने हिस्सा नहीं लिया. यह घटना उनके रिटायरमेंट से ठीक पहले की अवधि की है. उन्होंने कहा कि उस समय वह यूनिट चीफ थीं, इसलिए रिकॉर्ड में उनका नाम आना स्वाभाविक है.
डॉ. ललितांबिका ने बताया कि उस समय कोविड से संक्रमित गर्भवती महिलाओं के इलाज को प्राथमिकता दी जा रही थी. जिस मरीज को भर्ती किया गया था, उसके पेट से करीब साढ़े तीन किलो वजन वाला एक ट्यूमर निकालना था, जिस पर कैंसर होने का संदेह था. हालांकि, उस सर्जरी में वह व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं थीं.
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मरीज उषा के पेट में जो चीज फंसी पाई गई, वह कैंची नहीं बल्कि “मस्किटो” नाम का एक बेहद छोटा सर्जिकल उपकरण है. डॉक्टर के अनुसार एक्स-रे में दिखने वाली तस्वीर मैग्नीफाइड होती है, जिससे वह बड़ी नजर आती है. उन्होंने माना कि किसी भी स्थिति में उपकरण का शरीर के अंदर रह जाना गलत है.
डॉ. ललितांबिका ने सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि निजी अस्पतालों की तरह यहां सर्जिकल उपकरण गिनने के लिए अलग स्टाफ नहीं होता. आमतौर पर डॉक्टर और नर्सें ही ऑपरेशन से पहले और बाद में उपकरणों की गिनती करते हैं. अगर इसमें चूक हो जाए, तो ऐसी घटनाएं हो सकती हैं. यह किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता है.
उन्होंने यह भी कहा कि मरीज की पहले भी सर्जरी हो चुकी है. ऐसे में यह निश्चित तौर पर कहना मुश्किल है कि उपकरण उसी सर्जरी के दौरान छूटा या किसी पुराने ऑपरेशन का हिस्सा है. यदि ऑपरेशन रजिस्टर और सर्जिकल नोट्स की जांच की जाए, तो यह साफ हो जाएगा कि वास्तव में सर्जरी किस डॉक्टर ने की थी.
स्वास्थ्य प्रभाव को लेकर डॉ. ललितांबिका ने कहा कि पेट में सर्जिकल उपकरण रह जाने से जरूरी नहीं कि मरीज को कोई गंभीर नुकसान हो. उन्होंने दावा किया कि ऐसा उपकरण 50 साल तक भी शरीर में रह सकता है और जरूरी नहीं कि उससे कोई समस्या हो. मरीज द्वारा शिकायत की जा रही लगातार दर्द की वजह उपकरण नहीं, बल्कि यूरिनरी स्टोन है, जो अल्ट्रासाउंड जांच में सामने आया है.
फिलहाल यह मामला राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी अस्पतालों में सर्जिकल प्रोटोकॉल को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.


