6th House Astrology Stress and Health symptoms। जन्मकुण्डली का छठा भाव कैसे बताता है तनाव

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6th House Astrology : कभी आपने सोचा है कि एक ही परिस्थिति में दो लोग बिल्कुल अलग तरह से क्यों प्रतिक्रिया देते हैं? कोई मुश्किलों से लड़कर और मजबूत हो जाता है, तो कोई भीतर ही भीतर टूटने लगता है. ज्योतिष शास्त्र में इसका एक दिलचस्प उत्तर छिपा है जन्मकुण्डली का छठा भाव. आमतौर पर इसे रोग, ऋण और शत्रु भाव कहा जाता है, लेकिन अनुभवी ज्योतिषाचार्य इसे व्यक्ति की आन्तरिक शक्ति और तनाव सहने की क्षमता से भी जोड़कर देखते हैं. जब जीवन में दबाव बढ़ता है, तब यही भाव बताता है कि व्यक्ति परिस्थितियों को मात देगा या खुद हार मान लेगा. लग्न और छठे भाव का परस्पर संबंध मानसिक और शारीरिक संतुलन की पूरी कहानी कह देता है.

छठा भाव: केवल रोग नहीं, आन्तरिक शक्ति का संकेत
जन्मकुण्डली का छठा भाव पारंपरिक रूप से रोग, शत्रु और संघर्ष का प्रतिनिधि माना जाता है. लेकिन इसे केवल बीमारी तक सीमित कर देना अधूरा दृष्टिकोण है. यह भाव बताता है कि व्यक्ति चुनौतियों से कैसे निपटेगा.

यदि छठा भाव और उसका स्वामी मजबूत हो, तो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी टिके रहने की क्षमता रखता है. लेकिन यदि यह भाव पाप ग्रहों से पीड़ित हो या लग्न कमजोर हो, तो तनाव जल्दी असर दिखाता है कभी अनिद्रा के रूप में, कभी उच्च रक्तचाप, तो कभी मानसिक बेचैनी के रूप में.

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लग्न और छठे भाव का सम्बन्ध
लग्न शरीर और व्यक्तित्व का दर्पण है. जब लग्न और छठे भाव के बीच अशुभ सम्बन्ध बनते हैं, तो व्यक्ति का आत्मबल प्रभावित होता है. ऐसे लोग अक्सर छोटी-छोटी बातों को दिल पर ले लेते हैं और तनाव का दबाव भीतर जमा करते रहते हैं.

छठे भाव में सूर्यादि नवग्रहों का प्रभाव
छठे भाव में सूर्य
यदि छठे भाव में सूर्य स्थित हो, तो जातक को स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ मिल सकती हैं. वृष, वृश्चिक या कुम्भ राशि में हो तो हृदय या दमा कष्ट संभव है. मिथुन, कन्या या मीन में हो तो क्षय रोग का संकेत मिलता है. हालांकि शुभ दृष्टि मिलने पर व्यक्ति रोगों से उबरने की क्षमता भी रखता है.

छठे भाव में चन्द्रमा
शुभ चन्द्रमा मानसिक संतुलन देता है. लेकिन वृष में कण्ठ रोग, वृश्चिक में बवासीर, और मिथुन, कन्या, धनु या मीन में कफ विकार की आशंका रहती है. चन्द्रमा का सीधा संबंध मन से है, इसलिए इसकी स्थिति तनाव सहने की क्षमता को प्रभावित करती है.

छठे भाव में मंगल
यदि मंगल मिथुन या कन्या में हो और शुभ दृष्टि न हो, तो त्वचा या कुष्ठ रोग का संकेत मिलता है. मंगल ऊर्जा का ग्रह है असंतुलित हो जाए तो आक्रोश और आंतरिक बेचैनी बढ़ती है.

छठे भाव में बुध
बुध के अशुभ होने पर हाथ-पांव, श्वास या मानसिक रोग की संभावना बनती है. ऐसे जातक अक्सर ज्यादा सोचते हैं, जिससे मानसिक थकान बढ़ती है.

छठे भाव में गुरु
गुरु यहां बलहीनता दे सकता है, विशेषकर जब पाप ग्रहों से युक्त हो. राहु या शनि की राशि में होने पर गंभीर रोगों की आशंका बढ़ जाती है.

छठे भाव में शुक्र
यदि शुक्र नीचस्थ, अस्त या शत्रु क्षेत्र में हो तो रोग बढ़ सकते हैं. यह जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं का भी संकेत देता है.

छठे भाव में शनि
सिंह या वृश्चिक में शनि हृदय या मूत्राशय संबंधी रोग दे सकता है. मिथुन, कन्या, धनु या मीन में क्षय रोग की संभावना बताई गई है. शनि दीर्घकालिक तनाव का प्रतीक है.

छठे भाव में राहु-केतु
उच्चस्थ राहु-केतु रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं, लेकिन अशुभ अवस्था में अज्ञात या रहस्यमय रोगों का कारण बन सकते हैं.

तनाव और ज्योतिष: व्यावहारिक समझ
आज के दौर में तनाव केवल ग्रहों का खेल नहीं, जीवनशैली का भी परिणाम है. लेकिन जन्मकुण्डली संकेत जरूर देती है कि किस क्षेत्र में सावधानी रखनी चाहिए. कई ज्योतिषी सलाह देते हैं कि छठा भाव कमजोर हो तो नियमित योग, प्राणायाम और अनुशासित दिनचर्या अपनानी चाहिए.



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