लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों नौकरशाही बनाम विधायिका की जंग तेज हो गई है. प्रदेश के विधायकों की फोन कॉल अनसुनी करने वाले लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ अब विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने कड़ा रुख अपनाया है. दरअसल, सदन में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से अधिकारियों के ‘अड़ियल’ और ‘असहयोगात्मक’ रवैये पर जताई गई गहरी नाराजगी के बाद, स्पीकर ने इसे ‘गंभीर चिंता का विषय’ बताया है. महाना ने योगी सरकार को दो टूक लहजे में निर्देशित किया है कि जो अधिकारी सरकारी आदेशों का पालन नहीं कर रहे और जनप्रतिनिधियों को नजरअंदाज कर रहे हैं, उनके खिलाफ तत्काल कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो.
अफसरों का रवैया सेवा नियमावली का उल्लंघन: स्पीकर
विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने स्पष्ट किया कि विधायक केवल जनहित के कार्यों के लिए ही अधिकारियों से संपर्क करते हैं. उन्होंने कहा, ‘यह अधिकारियों का संवैधानिक कर्तव्य है कि वे विधायकों के फोन का उत्तर दें, उन्हें पर्याप्त समय दें और उचित सम्मान प्रदान करें.’ महाना ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि सरकारी निर्देशों की अनदेखी करना ‘सेवा नियमावली’ का सीधा उल्लंघन है. यदि अधिकारी अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं लाते, तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करना सदन की मजबूरी बन जाएगी.
विपक्ष ने उठाई आवाज, सत्तापक्ष ने भी मिलाए सुर
इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब सदन में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडे ने अधिकारियों की मनमानी का मुद्दा उठाया. पांडे ने आरोप लगाया कि ‘अगर विधायक किसी समस्या के समाधान के लिए फोन करते हैं, तो अधिकारी फोन उठाना तक जरूरी नहीं समझते. कभी-कभी दो-तीन दिन बाद फोन आता है और कभी वह भी नहीं. अगर नौकरशाही इसी तरह विधायिका पर हावी रही, तो लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हो जाएगा.’
हैरानी की बात यह रही कि इस मुद्दे पर विपक्ष को सत्तापक्ष का भी साथ मिला. समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण ने सदन में स्वीकार किया कि कुछ अधिकारी ‘सुस्त, बदतमीज और बेईमान’ हो सकते हैं.
मिसाल पेश करे सरकार, ताकि दोबारा न हो ऐसी घटना
सतीश महाना ने संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना को कड़े निर्देश देते हुए कहा कि सरकार के स्तर पर इस संबंध में ‘सख्त संदेश’ भेजा जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘यह उचित है कि यदि सरकार द्वारा जारी आदेशों का अधिकारियों के स्तर पर कार्यान्वयन नहीं हो रहा है, तो उनके खिलाफ नियमों के अनुसार कड़ी कार्रवाई की जाए. एक ऐसी मिसाल कायम होनी चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो.’
समन्वय के लिए बनेगा नया सिस्टम
स्पीकर ने समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण के उस सुझाव पर भी संज्ञान लिया, जिसमें जिला और राज्य स्तर पर एक ऐसी व्यवस्था बनाने की बात कही गई थी जो विधायकों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य कर सके. महाना ने कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के विश्वास पर काम करते हैं, और सार्वजनिक सेवाओं की प्रभावी डिलीवरी सुनिश्चित करने के लिए अधिकारियों को उनके साथ समन्वय में काम करना ही होगा.
संविधान का दिया हवाला, दी अवमानना की चेतावनी
विधानसभा अध्यक्ष ने संविधान के अनुच्छेद 164(2) और अनुच्छेद 194 का हवाला देते हुए याद दिलाया कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है. उन्होंने पुरानी घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि पहले भी सदन को अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा है. महाना ने आगाह किया कि यदि असहयोग और अनादर का सिलसिला जारी रहा, तो इसे सदन की अवमानना और विशेषाधिकार हनन माना जाएगा, जिसके गंभीर परिणाम होंगे.
तो वहीं दूसरी तरफ, विधानसभा में अधिकारियों के असहयोगात्मक रवैये पर मचे घमासान के बीच सरकार ने समाधान निकाल लिया है. समाज कल्याण मंत्री असीम अरुण के सुझाव पर सरकार ‘संवाद सेतु’ ऐप विकसित कर रही है. इस ऐप की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच सीधे संवाद का माध्यम बनेगा. यदि किसी विधायक या माननीय का फोन आता है और अधिकारी उसे नहीं उठाता, तो उसे 10 मिनट के भीतर कॉल बैक करना होगा. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो सीधे लखनऊ स्थित कमांड सेंटर से अधिकारी को अलर्ट भेजा जाएगा, जिसके बाद उसे तत्काल बात करनी होगी.
25 फरवरी से तीन जिलों में पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत
इस हाई-टेक व्यवस्था को लागू करने की तैयारी पूरी हो चुकी है. आगामी 25 फरवरी से इसे पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर तीन जिलों हरदोई, गाजियाबाद और कन्नौज में शुरू किया जाएगा. यह सुविधा सरकारी अधिकारियों के आधिकारिक CUG नंबर पर ही उपलब्ध कराई जाएगी. इन तीन जिलों में सफलता मिलने के बाद इसे पूरे प्रदेश में लागू करने की योजना है.


