कुछ गाने ऐसे होते हैं, जो सीधे दिल में उतरकर जुबान पर चढ़ जाते हैं. ऐसा ही एक गाना है, जिसको सुनने के बाद पता ही नहीं लगता 8 मिनट कहा खत्म हो गए. बात कर रहे हैं, उस्ताद नुसरत फतेह अली खान की अमर सूफी कव्वाली ‘पिया रे पिया रे’ की. सूफी सम्राट की गहराई से भरी आवाज इस धुन को दिल की धड़कन बना देती है. बोल सरल लेकिन गहरे हैं: ‘पिया रे पिया रे…थारे बिना लागे नाहीं म्हारा जिया रे… नैनों ने थारी कैसा जादू किया रे’ यहां ‘पिया’ शब्द यहां महज प्रेमी नहीं, बल्कि उस परम सत्ता का प्रतीक है, जिससे मिलने की तड़प हर इंसान के भीतर छिपी होती है. गीत में प्रेम की मिठास भी है और विरह का दर्द भी, जो हर श्रोता को भीतर तक छू जाता है. नुसरत साहब की आलाप और सुरों की उठान मानो आत्मा को एक अलग ही संसार में ले जाती है, जहां इश्क सांसारिक सीमाओं से ऊपर उठकर इश्क-ए-हकीकी बन जाता है. यही वजह है कि यह कलाम आज भी सूफी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसा हुआ है.


