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कन्नौज को इत्र नगरी के नाम से देश-दुनिया में पहचान मिली हुई है. यहां हजारों वर्षों से पारंपरिक तरीके से प्राकृतिक इत्र तैयार किए जा रहे हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह कला आज भी डेग-भापका पद्धति से जीवित है. कन्नौज में बनने वाले इत्र पूरी तरह नेचुरल तत्वों से तैयार होते हैं, जिनकी खुशबू लंबे समय तक टिकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इनकी जबरदस्त कीमत है.
कन्नौज: कन्नौज को इत्र नगरी के नाम से देश-दुनिया में पहचान मिली हुई है. यहां हजारों वर्षों से पारंपरिक तरीके से प्राकृतिक इत्र तैयार किए जा रहे हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह कला आज भी डेग-भापका पद्धति से जीवित है. कन्नौज में बनने वाले इत्र पूरी तरह नेचुरल तत्वों से तैयार होते हैं, जिनकी खुशबू लंबे समय तक टिकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इनकी जबरदस्त मांग रहती है.
ऊद और गुलाब के इत्र की आसमान छूती कीमत
रूह केवड़ा, रूह बेला और कस्तूरी भी शामिल
ऊद और रूह गुलाब के अलावा रूह केवड़ा जिसकी कीमत 17 से 18 लाख रुपए तक पहुंचती है. रूह बेला और कस्तूरी जैसे इत्र भी 10 से 12 लाख रुपये प्रति किलो में बिकते हैं. इन इत्रों की खासियत यह है कि इन्हें विशेष फूलों, जड़ी-बूटियों और लकड़ियों से महीनों की प्रक्रिया के बाद तैयार किया जाता है. प्राकृतिक संसाधनों की सीमित उपलब्धता के कारण इनकी कीमतें ऊंची रहती हैं. इन सभी इत्र के कम कीमत वाले इतर भी बनाए जाते हैं जो लोगों के बजट में आसानी से फिट हो जाते हैं.
लाखों में है कीमत
कन्नौज के इत्र व्यापारी निशीष तिवारी बताते हैं कि यहां सबसे हाई नोट से लेकर लो नोट तक के इत्र तैयार किए जाते हैं. यानी कम कीमत से लेकर बेहद महंगे इत्र तक, हर वर्ग के लिए विकल्प मौजूद हैं. कन्नौज की यही खासियत इसे देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी एक अलग पहचान दिलाती है. खुशबू की यह विरासत आज भी पूरी शान के साथ आगे बढ़ रही है.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें


