बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, दक्षिण एशिया में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली महिला नेता के रूप में मशहूर रही हैं, अब भारत में निर्वासन में रह रही हैं. यह उनकी जिंदगी में दूसरी बार है जब वे निर्वासन में हैं. 1975 में उनके पिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद वे छह साल भारत में रुकी थीं. अगस्त 2024 में छात्रों और जनता के विद्रोह के बाद 78 साल की हसीना ने भारत में शरण ली. अब उनके सामने कानूनी केस, राजनीति से दूर रहना, अवामी लीग पार्टी में लीडरशिप की कमी और कूटनीतिक मुश्किलें हैं. फरवरी 2026 के चुनाव में BNP की बड़ी जीत और तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने से हसीना जी के लिए हालात और मुश्किल हो गए हैं. उनकी विरासत अब कोर्ट केसों, अंतरराष्ट्रीय रिश्तों और अवामी लीग के भविष्य के सवालों में फंसी हुई है.
सामने आने की जरूरत: अवामी लीग को नई ऊर्जा देने का मौका
आज जब बांग्लादेश की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर है, BNP की भारी जीत और नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान के शपथ ग्रहण के बाद जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की सोच बदल रही है. ऐसे समय में शेख हसीना का सामने आना अवामी लीग के जागरण के लिए बेहद जरूरी है. भारत से दिए गए उनके बयानों में उन्होंने फरवरी 2026 के चुनाव को “अवैध” बताया और कहा कि अवामी लीग को अनुचित तरीके से बाहर रखा गया, लेकिन इन बयानों का व्यापक असर नहीं हुआ. अगर वे खुद सामने आतीं, तो पार्टी कार्यकर्ताओं, नेताओं और जनमानस को सशक्त प्रेरणा मिलती. इससे न केवल आलोचना का जवाब मिलता, बल्कि अवामी लीग को पुनर्जीवित करने, कैडर को एकजुट करने और नए राजनीतिक युग में विश्वास देने का मौका मिलता. उनकी चुप्पी से समर्थकों में असमंजस है, जबकि सामने आकर संवाद करने कई अनसुलझे सवालों के जवाब मिल सकते थे.
कानूनी चुनौतियां: मौत की सजा से भ्रष्टाचार तक
शेख हसीना के सामने सबसे बड़ी चुनौती बांग्लादेश में दर्ज गंभीर मुकदमे हैं, जो उनके राजनीतिक भविष्य, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्याय प्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे हैं. सबसे प्रमुख मामला मानवता के खिलाफ अपराध का है—इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT-1) ने 17 नवंबर 2025 को 2024 के विद्रोह के दौरान सुरक्षा बलों की हिंसा (1,500 से अधिक मौतें) के लिए उन्हें मौत की सजा सुनाई. BNP ने फैसले का समर्थन किया, जबकि मानवाधिकार विशेषज्ञों ने निष्पक्षता पर सवाल उठाए. इसके अलावा, 27 नवंबर 2025 को भ्रष्टाचार के तीन मामलों में उन्हें 21 साल की सजा मिली. BNP सरकार के सत्ता में आने के बाद ये मुकदमे तेज होने की संभावना है, और नेता सलाहुद्दीन अहमद ने कहा है कि हसीना को वापस लाकर मुकदमों का सामना कराना जरूरी है. यह कानूनी लड़ाई अब राजनीतिक बदले की शक्ल ले रही है.
प्रत्यर्पण की मांग: भारत-बांग्लादेश संबंधों की परीक्षा
प्रत्यर्पण का मुद्दा भारत-बांग्लादेश रिश्तों की सबसे संवेदनशील धुरी बन चुका है. BNP नेता हुमायून कबीर ने हसीना को “आतंकवादी” बताकर भारत से उन्हें सौंपने की मांग की, ताकि वे मुकदमों का सामना करें. BNP के वरिष्ठ नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने 2013 की प्रत्यर्पण संधि का हवाला दिया. लेकिन यह मामला कानूनी से ज्यादा कूटनीतिक और राजनीतिक है. भारत ने अनुरोध की जांच की बात कही, लेकिन विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया कि हसीना “विशेष परिस्थितियों” में आई हैं. संधि का अनुच्छेद 6 राजनीतिक अपराधों में इनकार की अनुमति देता है. यह मुद्दा दोनों देशों की कूटनीति और क्षेत्रीय स्थिरता पर सवाल खड़ा कर रहा है, भारत को कानूनी और मानवीय संतुलन बनाना ज़रूरी हो गया है, इसलिए नई दिल्ली अपनी नीति को पूर्ण रूप से विचारशील ढंग से आगे बढ़ा रही है.
राजनीतिक विरासत: विकास और विवादों की दोधारी तलवार
शेख हसीना की राजनीतिक विरासत जटिल है, एक ओर उन्होंने बांग्लादेश को आधारभूत ढांचे, ऊर्जा और आर्थिक प्रोजेक्ट्स से मजबूत किया, जिससे देश को वैश्विक सम्मान मिला; दूसरी ओर, उनके शासन की लोकतंत्र, मानवाधिकार और सत्ता संतुलन पर आलोचना हुई है. 2024 के विद्रोह और उसके बाद के बदलाव ने बांग्लादेश को नए दौर में ला दिया, जहां अवामी लीग बनाम BNP की पारंपरिक दुश्मनी से आगे युवा-नेतृत्व वाले नए समूह उभर रहे हैं जैसे एनसीपी. अवामी लीग पर एंटी-टेररिज्म एक्ट के तहत लगा बैन और चुनाव से बाहर रहना पार्टी के पतन का संकेत है. सवाल है कि क्या अवामी लीग हसीना के बिना अपनी पहचान बचा पाएगी, या बांग्लादेश बहुदलीय प्रणाली की ओर बढ़ेगा? हसीना की विरासत का मूल्यांकन अब लोकतंत्र और युवा उम्मीदों के पैमाने पर होगा.
अनिश्चित भविष्य: चुनौतियां और संभावनाएं
शेख हसीना का भविष्य चुनौतीपूर्ण है, मुकदमों में मौत की सजा, भ्रष्टाचार के आरोप, प्रत्यर्पण की मांग और पार्टी का पुनर्निर्माण. BNP सरकार के साथ बांग्लादेश में स्थिरता की उम्मीद है, लेकिन हसीना का मुद्दा अनसुलझा है. देश में प्रत्यर्पण पर राजनीतिक बातचीत जारी है, और भारत-बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाना कठिन है. हसीना का राजनीतिक और व्यक्तिगत भविष्य कई स्तरों पर सवालों से घिरा है, कानूनी लड़ाई, कूटनीतिक प्रयास या पार्टी की कमान. अगर वे सामने आतीं, तो अवामी लीग को नई जान मिल सकती है. बांग्लादेश अब बदलाव के दौर में है, जहां नई विचारधाराएं और युवा राजनीति को आकार दे रहे हैं. शेख हसीना को युवा, विकास, पार्टी, विरासत, नई सोच, बदलती राजनीति सभी के बीच बेहतरीन संतुलन बनाना होगा, जो केवल सामने आकर ही संभव है, टेक्स्ट इंटरव्यू या बयां जारी करने से कनेक्शन नहीं बनता.


