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यूपी न्यूजः सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने जानकारी दी कि अधिकांश अधिकारियों ने संपत्ति विवरण जमा कर दिया है, लेकिन एक आईपीएस अधिकारी अब भी लंबित है. हालांकि नाम का खुलासा नहीं किया गया. सरकार ने स्पष्ट किया है कि संपत्ति विवरण दाखिल करना सेवा नियमों का अनिवार्य हिस्सा है. ऐसा न करना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि इसे अनुशासनहीनता भी माना जा सकता है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा बजट सत्र
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों पारदर्शिता और जवाबदेही का मुद्दा गर्म है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार लगातार अधिकारियों से अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक नियमों के तहत जमा करने पर जोर देती रही है, ताकि प्रशासन में साफ-सुथरी छवि बनी रहे. लेकिन इसी बीच एक ऐसा मामला सामने आया जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का ध्यान खींच लिया है. राज्य का एकमात्र आईपीएस अधिकारी जिसने तय समयसीमा और स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अपनी संपत्ति का विवरण शासन को नहीं सौंपा.
दरअसल, उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के दौरान आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की संपत्ति रिटर्न न देने के मुद्दे पर गहमागहमी हो गई. विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) ने सदन में नौकरशाही पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और सरकार से पूछा कि किन अधिकारियों ने अपनी अचल संपत्ति का ब्यौरा समय पर नहीं दिया. इसी चर्चा के दौरान बात छिड़ी और ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ हो गया.
सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने जानकारी दी कि अधिकांश अधिकारियों ने संपत्ति विवरण जमा कर दिया है, लेकिन एक आईपीएस अधिकारी अब भी लंबित है. हालांकि नाम का खुलासा नहीं किया गया. सरकार ने स्पष्ट किया है कि संपत्ति विवरण दाखिल करना सेवा नियमों का अनिवार्य हिस्सा है. ऐसा न करना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि इसे अनुशासनहीनता भी माना जा सकता है. सूत्रों के अनुसार यदि संबंधित अधिकारी जल्द ही विवरण जमा नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई संभव है, जिसमें वेतन रोकने जैसे कदम भी शामिल हो सकते है.
राज्य सरकार की नियमावली के अनुसार सभी उच्च अधिकारियों को अपनी अचल संपत्ति, चल संपत्ति, बैंक बैलेंस, बैंक खातों आदि की जानकारी समय-समय पर दाखिल करनी होती है. इससे यह सुनिश्चित होता है कि अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग न करें और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की दिशा में कदम आगे बढ़ें.
इस मामले को विपक्ष ने गंभीर बताते हुए कहा कि जब शीर्ष स्तर पर पारदर्शिता की बात की जा रही है तब ऐसे उदाहरण प्रशासनिक छवि को नुकसान पहुंचाते है. वहीं सरकार ने दोहराया कि कोई भी अधिकारी नियमों से ऊपर नहीं है और सभी पर समान रूप से कार्रवाई की जाएगी. अब निगाहें इस बात पर टिकी है कि संबंधित आईपीएस अधिकारी कब तक अपनी संपत्ति का विवरण सौंपते हैं और शासन इस मामले में आगे क्या कदम उठाएगा.
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