नई दिल्ली (Job vs Startup). क्या आपको लगता है कि भारी-भरकम डिग्री आपके करियर की नैया पार लगा देगी? अगर हां तो संभल जाइए. आज की दुनिया इस पर नहीं चलती कि आपने कॉलेज में क्या पढ़ा, बल्कि इस पर चलती है कि आप असल में क्या कर सकते हैं. किताबी ज्ञान वाला दौर लद चुका है. अब जमाना स्किल और स्मार्ट वर्क का है- एक तरफ है स्किल-बेस्ड नौकरी और दूसरी तरफ खुद का कुछ करने का यानी Entrepreneurship का सपना. लेकिन सवाल यह है कि जाएं किस दिशा में.
स्किल-बेस्ड जॉब: हुनर से बनाएं पहचान
आज कंपनियां किसी कैंडिडेट की मार्कशीट से पहले उसकी स्किल चेक करती हैं. डेटा साइंस, एआई, हेल्थकेयर और डिजिटल मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में उन्हीं की पूछ है, जिन्हें काम की प्रैक्टिकल नॉलेज है. डॉ. कविता कानाबर का मानना है कि वोकेशनल ट्रेनिंग (व्यवसायिक शिक्षा) लेने वाले स्टूडेंट्स उन लोगों से कहीं आगे निकल जाते हैं, जो सिर्फ थ्योरी के भरोसे बैठे हैं. असल में, एआई के दौर में वही टिकेगा जो खुद को तेजी से अपडेट करना जानता हो.
स्टार्टअप माइंडसेट: खुद का बॉस बनने का जज्बा
‘स्किल इंडिया’ का असली मकसद स्टूडेंट्स को सिर्फ नौकरी के लिए तैयार करना नहीं, बल्कि उन्हें मालिक बनने के काबिल बनाना है. उद्यमिता (Entrepreneurship) का मतलब सिर्फ पैसा कमाना नहीं, बल्कि रिस्क लेना, टीम बनाना और चुनौतियों को मौके में बदलना है. जब कोई स्टूडेंट कॉलेज के दिनों से ही स्टार्टअप माइंडसेट रखता है तो वह न केवल अपने लिए रास्ता बनाता है, बल्कि दूसरों के लिए भी नौकरियां पैदा करता है. यही नए भारत की आर्थिक ताकत है.
बैलेंस ही है सफलता का असली मंत्र
प्रोफेशनल लाइफ में सफलता हासिल करने के लिए नौकरी और बिजनेस को अलग-अलग चश्मे से देखना बंद करना जरूरी है. इस बात को समझिए कि दोनों की बुनियाद एक ही है- हुनर. एक अच्छा एजुकेशन सिस्टम वही है जो स्टूडेंट को सही फैसला लेने के काबिल बनाए. स्टूडेंट पूरे कॉन्फिडेंस के साथ चुन सके कि उसे किसी कंपनी का हिस्सा बनना है या अपनी खुद की कंपनी खड़ी करनी है. जब आपके पास सही स्किल होगी तो आप कभी बेरोजगार नहीं रहेंगे.
स्टार्टअप vs पक्की नौकरी से जुड़े 5 सवाल-जवाब
1. क्या आप ‘रिस्क’ से डरते हैं या उसे ‘मैनेज’ करना जानते हैं?
- पक्की नौकरी: यहां रिस्क कम है. महीने के अंत में सैलरी आने की गारंटी है, जो आपको मानसिक शांति और वित्तीय सुरक्षा (EMI, बिल आदि के लिए) देती है.
- स्टार्टअप: यहां रिस्क बहुत ज्यादा है. शुरुआती कुछ सालों तक हो सकता है कि आपकी कोई कमाई न हो. अगर आप अनिश्चितता के साथ जी सकते हैं और प्लान-B तैयार रख सकते हैं, तभी स्टार्टअप आपके लिए है.
2. आपको ‘स्पेशलाइजेशन’ चाहिए या ‘मल्टी-टास्किंग’?
- पक्की नौकरी: कॉर्पोरेट में आपका एक फिक्स्ड रोल होता है (जैसे- केवल मार्केटिंग या कोडिंग). आप एक क्षेत्र के एक्सपर्ट बनते हैं.
- स्टार्टअप: यहां आपको ‘एक साथ कई टोपियां’ पहननी पड़ती हैं. आप खुद ही CEO हैं और कभी-कभी खुद ही ऑफिस बॉय. अगर आप सब कुछ सीखने के शौकीन हैं तो स्टार्टअप बेस्ट है.
3. आपके लिए ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ कितना जरूरी है?
- पक्की नौकरी: आमतौर पर 9 से 5 या 6 की शिफ्ट होती है. वीकेंड खाली होते हैं और आप पर्सनल लाइफ के लिए समय निकाल पाते हैं.
- स्टार्टअप: यहां काम खत्म होने का कोई समय नहीं होता. स्टार्टअप आपके जीवन का हिस्सा बन जाता है, जिससे अक्सर पर्सनल लाइफ और नींद प्रभावित हो सकती है.
4. आप ‘आदेश’ मानना पसंद करते हैं या ‘निर्णय’ लेना?
- पक्की नौकरी: आपको पहले से तय नियमों और सीनियर के निर्देशों का पालन करना होता है. इसमें स्टेबिलिटी है लेकिन क्रिएटिव फ्रीडम सीमित हो सकती है.
- स्टार्टअप: यहां हर फैसला आपका है. आप खुद नियम बनाते हैं. अगर आपमें लीडरशिप की भूख है और आप दूसरों के आदेशों पर नहीं चलना चाहते तो स्टार्टअप का रास्ता चुनें.
5. आपका ‘वित्तीय लक्ष्य’ (Financial Goal) क्या है?
- पक्की नौकरी: यहां धीरे-धीरे और लगातार ग्रोथ होती है. आप एक तय समय के बाद अमीर बन सकते हैं (जैसे- रिटायरमेंट फंड).
- स्टार्टअप: यहां ‘जीरो या हीरो’ वाली स्थिति होती है. अगर स्टार्टअप सफल हुआ तो आप उतनी दौलत कमा सकते हैं जो नौकरी में नामुमकिन है. लेकिन विफलता की स्थिति में जमा-पूंजी भी दांव पर लग सकती है.


