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Animal Fodder Making Tips: कई किसान फसल कटने के बाद पराली को बेकार समझकर जला देते हैं, लेकिन यही पराली सही तरीके से तैयार की जाए तो गाय और भैंसों के लिए पौष्टिक चारा बन सकती है. यूरिया उपचारित पराली मुलायम, स्वादिष्ट और आसानी से पचने योग्य होती है, जिससे पशु स्वस्थ रहते हैं और दूध उत्पादन भी बढ़ता है. इस तरीके से किसानों को महंगा चारा खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती और पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है. अब किसान पराली को जलाने की बजाय इसका सही उपयोग कर लाभ कमा रहे हैं और पशुपालन को फायदेमंद बना रहे हैं.
अक्सर किसान फसल की कटाई के बाद पराली को बेकार समझकर खेतों में ही जला देते हैं. लेकिन यही पराली आपके गाय-भैंसों के लिए ताकत का खजाना बन सकती है. पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. अश्वनी कुमार के अनुसार, अगर सूखी पराली का सही तरीके से ‘यूरिया उपचार’ किया जाए, तो इसकी पौष्टिकता कई गुना बढ़ जाती है. यह न केवल पर्यावरण को बचाने का तरीका है, बल्कि पशुपालकों के लिए चारे पर होने वाले भारी खर्च को कम करने का सबसे सस्ता और वैज्ञानिक जुगाड़ भी है.
पराली जलाने से न केवल खेत की उपजाऊ मिट्टी कमजोर होती है, बल्कि हवा भी जहरीली हो जाती है. वहीं, इसी पराली को चारे के रूप में इस्तेमाल करने पर किसान को दोहरा फायदा मिलता है. एक तरफ तो प्रदूषण रुकता है, दूसरी तरफ पशुओं के लिए सालभर के चारे का इंतजाम हो जाता है. अब प्रगतिशील किसान पराली को बोझ नहीं, बल्कि एक कीमती संसाधन मान रहे हैं जो पशुपालन के व्यवसाय को और भी आसान बना देता है.
पराली को पौष्टिक बनाने के लिए सबसे पहले उसकी कुट्टी (छोटे टुकड़े) कर ली जाती है. इसके बाद प्रति 100 किलो पराली के लिए 4 किलो यूरिया को करीब 40-50 लीटर पानी में घोलकर एक स्प्रे तैयार किया जाता है. इस घोल को पराली की परतों पर अच्छी तरह छिड़का जाता है. इस प्रक्रिया के बाद पराली को एक प्लास्टिक शीट या पुआल से अच्छी तरह ढंक दिया जाता है ताकि अंदर अमोनिया गैस बन सके. यही गैस पराली को मुलायम और सुपाच्य बनाती है.
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यूरिया छिड़काव के बाद पराली को कम से कम 21 दिनों तक हवा बंद स्थिति में रखना अनिवार्य होता है. इस दौरान पराली के भीतर रासायनिक बदलाव होते हैं और उसमें प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है. 21 दिन पूरे होने के बाद, चारे को बाहर निकालकर कुछ घंटों के लिए खुली हवा में छोड़ देना चाहिए ताकि अतिरिक्त गैस निकल जाए. किसान बताते हैं कि इस चारे को खाने के बाद पशु पहले से ज्यादा एक्टिव और सेहतमंद नजर आते हैं.
यूरिया उपचारित पराली खिलाने का सबसे बड़ा असर दूध की मात्रा और क्वालिटी पर पड़ता है. साधारण पराली में पोषण बहुत कम होता है, लेकिन उपचार के बाद इसमें प्रोटीन और ऊर्जा बढ़ जाती है. जब पशु को भरपूर पोषण मिलता है, तो उनकी दूध देने की क्षमता प्राकृतिक रूप से बढ़ जाती है. इससे पशुपालकों की रोज की आमदनी में इजाफा होता है और पशु का शरीर भी मजबूत बना रहता है.
इस तकनीक की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे बनाने में मामूली खर्च आता है. इसके लिए किसान को किसी बड़ी मशीन या महंगी फैक्ट्री की जरूरत नहीं होती. वह अपने घर के आंगन या खेत के एक कोने में ही यह चारा तैयार कर सकता है. थोड़े से यूरिया और अपनी मेहनत से छोटा किसान भी बाजार से महंगे दाने और चारे खरीदने की मजबूरी से बच सकता है, जिससे उसका शुद्ध मुनाफा बढ़ जाता है.
आम तौर पर पशु सूखी पराली खाना ज्यादा पसंद नहीं करते क्योंकि वह सख्त और बेस्वाद होती है. लेकिन यूरिया से उपचारित होने के बाद यही पराली मुलायम, नमकीन और स्वादिष्ट हो जाती है. पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं और जूठन भी नहीं छोड़ते. बेहतर पाचन के कारण पशुओं का पेट सही रहता है और वे कम बीमार पड़ते हैं, जिससे पशुपालक का दवाइयों और डॉक्टर पर होने वाला खर्च काफी हद तक कम हो जाता है.
अगर हर किसान पराली जलाने के बजाय उसे उपचारित करने की इस तकनीक को अपना ले, तो देश में चारे की समस्या काफी हद तक खत्म हो सकती है. यह तरीका न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारता है बल्कि मिट्टी के मित्र कीटों को भी सुरक्षित रखता है. समझदारी इसी में है कि जो पराली धुंआ बनकर उड़ जाती थी, उसे दूध और मुनाफे में बदला जाए. यही तकनीक आने वाले समय में पशुपालन को और भी ज्यादा फायदेमंद बनाएगी.


