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सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: भारत के सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता (संशोधन) एक्ट, 2019 की संवैधानिक वैधता पर आखिरी रेगुलर सुनवाई 5 मई से 12 मई 2026 तक तय की है. सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली एक हाई-प्रोफाइल बेंच 250 से ज़्यादा याचिकाओं की जांच करेगी. इसमें आईयूएमएल की याचिका भी शामिल है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि यह एक्ट संविधान के आर्टिकल 14 और 15 का उल्लंघन करता है. खास बात यह है कि कोर्ट ने असम और त्रिपुरा की खास शिकायतों पर अलग से सुनवाई करने का फैसला किया है.
सीजेआई सूर्यकांत ने सीएए के खिलाफ याचिका पर सुनवाई की तारीख तय की.
नई दिल्ली: नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), 2019 के खिलाफ पूर्वोत्तर राज्यों के मुस्लिम संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किया है. इसमें सीएए के संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है. सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से लंबित इस मामले अब ‘रेगुलर सुनवाई’ की तारीखें तय की है. कोर्ट ने असम और त्रिपुरा में सीएए के खिलाफ दाय याचिका को लेकर बताया कि इस पर मई में 5 से 12 तारीख तक लगातार सुनवाई होगी.
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच सुनवाई कर रही थी. उन्होंने बताया कि इस मामले पर गहन और नियमित सुनवाई 5 मई से लेकर 12 मई की जाएगी. बेंच ने यह भी साफ किया है कि असम और त्रिपुरा से जुड़े सीएए के विशेष मसलों और वहां की भौगोलिक व जनसांख्यिकीय चिंताओं को देखते हुए उन पर अलग से सुनवाई की जाएगी. आज की कार्यवाही के दौरान बेंच ने भविष्य की सुनवाई के लिए नई तारीखों पर मुहर लगाई है.
अब इस टाल नहीं सकते हैं
गुरुवार को सुनवाई के दौरान भारत के सीजेई जस्टिस सूर्यकांत की विशेष पीठ ने सभी पक्षों को सुनने के बाद यह माना कि अब इस मामले को और अधिक टाला नहीं जा सकता और इसकी मेरिट पर विस्तृत चर्चा जरूरी हैय
क्या हैं याचिकाकर्ताओं की दलीलें?
सीएए के खिलाफ इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) सहित करीब 250 अन्य याचिकाकर्ताओं ने मोर्चा खोला है. इन्होंने तर्क दिए हैं-
- संवैधानिक उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का स्पष्ट उल्लंघन है, जो समानता और धर्म के आधार पर भेदभाव न करने की गारंटी देते हैं.
- धार्मिक भेदभाव: आईयूएमएल का आरोप है कि सीएए कानून असंवैधानिक है क्योंकि यह सिर्फ धार्मिक पहचान के आधार पर एक विशेष वर्ग को लाभ देता है और मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है.
- मनमाने प्रावधान: याचिकाओं में कहा गया है कि कानून के प्रावधान ‘मनमाने’ हैं और भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे (Secular Fabric) को चोट पहुंचाते हैं.
2019 से 2026 तक का सफर
बता दें कि 2019 में संसद से पारित होने के बाद से ही सीएए देशव्यापी चर्चा और विवादों का केंद्र रहा है. केंद्र सरकार का तर्क है कि यह कानून पड़ोसी देशों (पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान) में धार्मिक उत्पीड़न का शिकार हुए अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए है, न कि किसी की नागरिकता छीनने के लिए. वहीं, विपक्ष और नागरिक समाज के कई समूह इसे भेदभावपूर्ण मानते हैं.
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दीप राज दीपक 2022 में न्यूज़18 से जुड़े. वर्तमान में होम पेज पर कार्यरत. राजनीति और समसामयिक मामलों, सामाजिक, विज्ञान, शोध और वायरल खबरों में रुचि. क्रिकेट और मनोरंजन जगत की खबरों में भी दिलचस्पी. बनारस हिंदू व…और पढ़ें


