Ganesh Kumar of Chhapra reveals success story from Bullet and eyewear shop

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Success Story: एक छोटी सी दुर्घटना इंसान की पूरी जिंदगी बदल सकती है. छपरा के गणेश कुमार इसका जीता-जागता उदाहरण हैं. बाइक चलाते समय आंख में कीड़ा गिरने से हुए एक हादसे ने उन्हें ऐसा बिजनेस आइडिया दिया कि आज वे अपनी सफेद बुलेट पर चलता-फिरता चश्मा शोरूम चलाते हैं. कम निवेश और अनोखे अंदाज वाले इस सफर ने उन्हें फर्श से अर्श तक पहुंचा दिया है.

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छपराः छपरा के गणेश कुमार की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. एक अचानक घटी घटना ने उन्हें चलता-फिरता व्यवसाई बना दिया. आज इसी व्यवसाय के दम पर उन्होंने न केवल जमीन खरीदकर अपना घर बनाया है, बल्कि अपने बच्चों को बेहतरीन शिक्षा भी दिला रहे हैं. जानिए गणेश कुमार की सक्सेस स्टोरी. जो आज के युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं.

सीतामढ़ी से छपरा तक का सफर
गणेश कुमार मूल रूप से सीतामढ़ी जिले के रहने वाले हैं, लेकिन उनके पिता दशकों पहले व्यवसाय के सिलसिले में छपरा आ गए थे. गणेश की पढ़ाई-लिखाई और परवरिश यहीं हुई. आज उन्होंने बाइक पर अपना एक ऐसा अनोखा स्टार्टअप शुरू किया है कि जिधर से भी वे गुजरते हैं, लोग उन्हें मुड़-मुड़कर देखते हैं.

क्या है इस बुलेट वाली दुकान की खासियत?
गणेश कुमार ने अपनी सफेद बुलेट को ही चश्मे की दुकान में तब्दील कर दिया है. उनकी बाइक पर सस्ते से लेकर कीमती और बेहतरीन क्वालिटी के चश्मे उपलब्ध रहते हैं. उनका अंदाज भी निराला है. सफेद बुलेट, कुर्ता-पायजामा, सिर पर पगड़ी और आंखों पर काला चश्मा. जब वे इस पहनावे में निकलते हैं, तो लोग उनके मुरीद हो जाते हैं. चश्मों की क्वालिटी अच्छी और दाम वाजिब होने के कारण उनकी बिक्री भी खूब होती है.

एक हादसे ने दिया बिजनेस आइडिया
गणेश बताते हैं कि यह सब एक दुर्घटना के बाद शुरू हुआ. एक दिन वे बिना चश्मा लगाए बुलेट से कहीं जा रहे थे, तभी उनकी आंख में एक कीड़ा चला गया. संतुलन बिगड़ने के कारण वे गिर पड़े और उन्हें गंभीर चोटें आईं. ठीक होने के बाद उन्होंने संकल्प लिया कि वे हाईवे पर चश्मा बेचेंगे, ताकि अन्य चालक धूल और कीड़ों से सुरक्षित रहकर अपनी यात्रा पूरी कर सकें.

मुनाफे का गणित और संघर्ष की जीत
गणेश के पिता पिछले 25 वर्षों से छपरा में चश्मे की दुकान चला रहे थे. जहां गणेश भी हाथ बंटाते थे. लेकिन हाईवे पर मोबाइल शॉप का विचार उनका अपना था. वे वर्तमान में गरखा प्रखंड के फुरसतपुर चौक पर हाईवे के किनारे अपनी बुलेट लगाते हैं. वे सीधे मैन्युफैक्चरर से माल खरीदते हैं, इसलिए बाजार से आधी कीमत पर चश्मा उपलब्ध कराते हैं. हर रविवार उनके पास चश्मों का नया कलेक्शन आता है. गणेश कुमार का मानना है कि बिजनेस कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि उसे करने का तरीका छोटा या बड़ा होता है. आज इसी सोच की बदौलत वे एक सफल जीवन जी रहे हैं और समाज के लिए एक उदाहरण बन चुके हैं.

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Amit ranjan

मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें



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