Hindu Marriage Vows: शादी के मंडप में अग्नि के चारों ओर सात फेरे लेते दूल्हा-दुल्हन की तस्वीर हम सबने देखी है. पंडित मंत्र पढ़ते हैं, दूल्हा वचन दोहराता है और दुल्हन चुपचाप सिर झुकाए रहती है. बचपन से देखी ये रस्म इतनी सामान्य लगती है कि शायद ही किसी ने सोचा हो-क्या सातों वचन दोनों के लिए समान होते हैं? और अगर हां, तो फिर लड़की को बोलकर स्वीकृति देने का मौका क्यों नहीं मिलता? हिंदू विवाह को सिर्फ सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि जीवनभर का आध्यात्मिक संकल्प माना गया है. इसी संकल्प का केंद्र है सप्तपदी यानी सात कदम और सात वचन. मगर परंपरा, समाज और धर्म की परतों में छिपा सच अक्सर अलग होता है. आज इसी सवाल को समझने की कोशिश करते हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से कि वचन किसके लिए हैं और दुल्हन की चुप्पी की कहानी क्या है.
सप्तपदी का अर्थ: सात कदम, सात जीवन संकल्प
हिंदू विवाह में सात फेरे सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि जीवन के सात आधारों पर साझेदारी की शपथ माने जाते हैं. मान्यता है कि इन सात कदमों के बाद ही विवाह पूर्ण माना जाता है. हर फेरा एक मूल्य से जुड़ा होता है-भोजन, शक्ति, समृद्धि, सुख-दुख, संतान, सम्मान और मित्रता. असल में सप्तपदी का मतलब है-जीवन के हर पहलू में साथ चलने का वादा. इसलिए ये वचन किसी एक पक्ष के लिए नहीं, बल्कि दोनों के साझा दायित्व का प्रतीक हैं.
हिंदू विवाह के सात वचन और उनका अर्थ
1. पहला वचन: अन्न और पोषण
इस वचन में दूल्हा-दुल्हन जीवन की बुनियादी जरूरतों को मिलकर पूरा करने का संकल्प लेते हैं. परंपरा में पति को कमाने वाला और पत्नी को गृहस्थ संभालने वाली माना गया, लेकिन मूल भाव है-परिवार का संतुलन.
2. दूसरा वचन: स्वास्थ्य और शक्ति
दोनों एक-दूसरे के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने का वादा करते हैं. जीवन में कठिन समय आए तो सहारा बनने का भाव इसी वचन में छिपा है.
3. तीसरा वचन: समृद्धि और सुरक्षा
यह आर्थिक स्थिरता और सुरक्षा का वचन है. पति-पत्नी मिलकर जीवन को सुरक्षित और संतुलित बनाने का संकल्प लेते हैं. आधुनिक अर्थ में यह साझा वित्तीय जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है.
4. चौथा वचन: सुख-दुख में साथ
शादी का भावनात्मक आधार यही है-हर परिस्थिति में साथ रहना. यह वचन रिश्ते को स्थायित्व देता है और जीवनभर के साथ का भरोसा बनाता है.
5. पांचवां वचन: संतान और परिवार
इसमें परिवार विस्तार, बच्चों के पालन-पोषण और मूल्यों के हस्तांतरण का संकल्प होता है. इसे वंश और परंपरा की निरंतरता से जोड़ा जाता है.
6. छठा वचन: दीर्घायु और सम्मान
पति-पत्नी एक-दूसरे के जीवन, स्वास्थ्य और गरिमा की रक्षा का वचन देते हैं. इसमें पारस्परिक सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा का भाव शामिल है.
7. सातवां वचन: प्रेम और मित्रता
अंतिम वचन विवाह को सिर्फ सामाजिक रिश्ता नहीं, बल्कि दोस्ती और प्रेम का बंधन मानता है. इसमें जीवनभर साथी बने रहने की प्रतिज्ञा होती है.
क्या सातों वचन दोनों के लिए होते हैं?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सातों वचन दूल्हा और दुल्हन दोनों के लिए समान रूप से लागू होते हैं. अग्नि के सामने दोनों मिलकर शपथ लेते हैं. विवाह को साझेदारी माना गया है, अधीनता नहीं. हालांकि पारंपरिक भूमिकाओं के कारण व्याख्या में फर्क दिखता है-पति कमाने वाला, पत्नी गृहस्थ संभालने वाली. मगर मूल दर्शन बराबरी का ही है. आज के समय में इन वचनों को जेंडर-न्यूट्रल रूप में समझा जाता है, जहां दोनों जीवनसाथी हर जिम्मेदारी साझा करते हैं.
दुल्हन की मौन स्वीकृति: परंपरा या पितृसत्ता?
सबसे बड़ा सवाल यही है-जब वचन दोनों के हैं, तो दुल्हन बोलकर स्वीकृति क्यों नहीं देती? धार्मिक आधार पर देखें तो कहीं भी ऐसा नियम नहीं कि दुल्हन मौन रहे. शास्त्रीय व्याख्या में दोनों की स्वीकृति आवश्यक मानी गई है. मगर सामाजिक परंपराओं ने धीरे-धीरे इसे बदल दिया. पुराने समाज में स्त्री की विनम्रता और चुप्पी को संस्कार से जोड़ा गया. माना गया कि दुल्हन का सिर झुकाना और मौन रहना ही उसकी स्वीकृति है. अगर वह जोर से बोलती तो उसे असंयमी या तेज माना जाता. यही सोच पीढ़ियों तक रस्म बन गई. यानी मौन स्वीकृति धार्मिक नियम से ज्यादा सामाजिक मानसिकता का परिणाम है.
वचन बराबरी का वादा
आज विवाह को साझेदारी के रूप में देखा जाता है. कई शादियों में दुल्हन भी वचन दोहराती है या दोनों मिलकर शपथ पढ़ते हैं. शहरी विवाहों में यह बदलाव तेजी से दिख रहा है. विद्वानों का मानना है कि सप्तपदी का मूल भाव बराबरी, सहयोग और मित्रता है. परंपरा में भले भूमिकाएं अलग थीं, मगर उद्देश्य साझा जीवन था. इसलिए आधुनिक संदर्भ में सात वचन जेंडर-न्यूट्रल प्रतिज्ञा माने जाते हैं.


