Holi 2026 | Shahjahanpur Unique Holi | शाहजहांपुर की अनोखी होली परंपरा

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Shahjahanpur Unique Holi Celebration: शाहजहांपुर की ‘लाट साहब’ वाली होली 1857 की क्रांति के उस दौर की याद दिलाती है जब कलम और तलवार के साथ-साथ त्यौहारों को भी अंग्रेजों के खिलाफ हथियार बनाया गया था. यहां लाट साहब को भैंसा गाड़ी पर बिठाकर उन पर जूते और झाड़ू बरसाने की परंपरा आज भी कायम है, जो प्रतीकात्मक रूप से फिरंगी हुकूमत के प्रति जनता के तिरस्कार को दर्शाती है. इतिहासकार डॉ. विकास खुराना के अनुसार, यह जुलूस उस समय के मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा था जिसने विद्रोह की लौ को लंबे समय तक जलाए रखा. जानिए कैसे नवाबों की पारंपरिक होली एक उग्र विद्रोही जुलूस में तब्दील हो गई और क्यों आज भी कड़ी सुरक्षा के बीच इस परंपरा को निभाया जाता है.

शाहजहांपुर: देश के बाकी हिस्सों में होली भाईचारे और रंगों का त्यौहार होती है, लेकिन शाहजहांपुर में यह एक ऐतिहासिक विद्रोह की याद दिलाती है. यहां 1857 की क्रांति के समय से ‘लाट साहब’ का जुलूस निकालने की परंपरा चली आ रही है. यह जुलूस सिर्फ एक उत्सव नहीं बल्कि उस समय के ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनता के मनोवैज्ञानिक युद्ध का प्रतीक है. आज भी शहर में इस परंपरा को उसी शिद्दत और कड़ी सुरक्षा के बीच निभाया जाता है जो इतिहास के पन्नों में दर्ज संघर्ष की याद दिलाता है.

इतिहासकार डॉ विकास खुराना ने बताया कि मध्यकाल से ही जुलूस मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए निकाले जाते रहे हैं. शाहजहांपुर में 1857 के दौरान विद्रोह सबसे लंबे समय तक चला और यहां कई बड़े जुलूस निकाले गए ताकि निज़ामत शासन को मजबूती दिखाई जा सके. हालांकि इस दौरान सांप्रदायिक तनाव भी पैदा हुआ और समृद्ध परिवारों को लूटा गया. जब ब्रिटिश अधिकारी गोवेन ने कमान संभाली तो जनता ने होली के पारंपरिक स्वरूप को बदलकर इसे अंग्रेजी शासन के विरोध का जरिया बना दिया. नवाबों की पुरानी होली इसी दौर में एक विद्रोही जुलूस में तब्दील हो गई.

आखिर शाहजहांपुर में ही क्यों?
शाहजहांपुर में इस परंपरा के जड़ जमाने का बड़ा कारण यहां विद्रोह का लंबा खिंचना था. 1857 की क्रांति के दौरान रोहिलखंड के अन्य इलाकों के मुकाबले यहां क्रांतिकारियों का प्रभाव अधिक समय तक रहा. सत्ता के प्रदर्शन और मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने के लिए जुलूस यहां एक मुख्य औजार बन गए थे. जब अंग्रेजों ने पुनः नियंत्रण किया तो स्थानीय लोगों ने अपनी भड़ास निकालने के लिए होली जैसे उत्सव को ही विरोध का मंच बना लिया जो बाद में एक स्थायी परंपरा बन गई.

आज भी जारी है जुलूस की परंपरा 
नवाबों के दौर में यहां होली मिलन का उत्सव हुआ करती थी लेकिन 1857 के घटनाक्रम ने इसके स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया. स्थानीय ज़मींदारों और जनता के बीच जो सांप्रदायिक और राजनीतिक खींचतान मची उसने इस जुलूस को और अधिक उग्र बना दिया. अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के जवाब में जनता ने ‘लाट साहब’ की कल्पना की और उसे अपमानित करने का यह तरीका निकाला. यही कारण है कि यह परंपरा शाहजहांपुर की पहचान बन गई और जो आज भी जारी है.

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Seema Nath

सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें



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