Amla Murabba Recipe: सर्दियों की धूप में दादी के हाथ का आंवला मुरब्बा याद है? वही हल्की खटास, चाशनी में डूबा मीठा स्वाद और खाने के बाद मिलने वाली ताजगी-यह सिर्फ मिठाई नहीं, घरेलू सेहत का एक पुराना राज है. इन दिनों जब लोग फिर से घर की चीज़ों की ओर लौट रहे हैं, आंवला मुरब्बा भी रसोई में वापसी कर रहा है. वजह साफ है-आंवले में भरपूर विटामिन C, पाचन में मदद और शरीर को ठंड-गर्मी सहने की ताकत देने की पारंपरिक मान्यता. खास बात यह कि इसे बनाना उतना मुश्किल नहीं जितना लगता है. सही आंवला चुनने से लेकर चाशनी की सही गाढ़ाई तक, कुछ आसान बातों का ध्यान रखा जाए तो घर पर भी वही बाज़ार जैसा चमकदार और स्वादिष्ट मुरब्बा तैयार हो सकता है.
आंवला मुरब्बा: परंपरा से ट्रेंड तक
आजकल सोशल मीडिया पर “होममेड हेल्दी रेसिपी” का चलन तेजी से बढ़ा है. इसी कड़ी में आंवला मुरब्बा फिर चर्चा में है. पोषण विशेषज्ञ बताते हैं कि आंवला एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर होता है और पारंपरिक तौर पर इसे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला माना जाता है. यही कारण है कि कई परिवार अब बाजार की मिठाइयों के बजाय घर का मुरब्बा पसंद कर रहे हैं. गांवों में तो यह लंबे समय से सर्दियों की तैयारी का हिस्सा रहा है. दिसंबर-जनवरी में बड़े, हल्के भूरे-हरे पके आंवले आते ही घरों में मुरब्बा बनता था, ताकि सालभर इस्तेमाल हो सके. अब वही आदत शहरों में भी लौट रही है.
सही आंवला चुनना क्यों जरूरी
1. हल्का पका आंवला देता है बेहतर स्वाद
मुरब्बा बनाने के लिए बहुत कच्चा आंवला नहीं लिया जाता. हल्का पका, थोड़ा भूरा-हरा आंवला कम खट्टा होता है और चाशनी को अच्छी तरह सोखता है. यही वजह है कि पारंपरिक रसोई में हमेशा बड़े और पके आंवले चुने जाते हैं.
2. भिगोने और छेद करने की प्रक्रिया
आंवले को दो-तीन बार धोकर एक दिन पानी में भिगोने की परंपरा सिर्फ सफाई के लिए नहीं है. इससे उसका रेशा थोड़ा नरम हो जाता है. बाद में कांटे से छोटे-छोटे छेद करने पर चाशनी अंदर तक जाती है. यही वह स्टेप है जो मुरब्बे को अंदर तक मीठा बनाता है.
चाशनी की सही गाढ़ाई: मुरब्बे की जान
1. धीमी आंच पर पकाना क्यों जरूरी
आंवला मुरब्बे की सबसे अहम कड़ी है चाशनी. चीनी और कम पानी के साथ धीमी आंच पर पकाने से आंवला अपना रस छोड़ता है और चाशनी में मिल जाता है. तेज आंच पर पकाने से चाशनी नीचे से भूरी हो सकती है, जिससे स्वाद बिगड़ता है.
2. धागेदार चाशनी का टेस्ट
पारंपरिक रसोई में चाशनी जांचने का आसान तरीका है-ठंडी बूंद को अंगुली और अंगूठे के बीच खींचना. अगर पतला धागा बने तो चाशनी तैयार मानी जाती है. इसी स्टेज पर आंवले को चाशनी में पकाकर मुरब्बा बनाया जाता है.
3. मसालों का हल्का ट्विस्ट बढ़ाता है स्वाद
जब मुरब्बा पककर तैयार हो जाए, तब उसमें काला नमक, इलायची पाउडर और थोड़ा काली मिर्च डालना कई घरों की परंपरा है. इससे स्वाद में हल्की चटपटाहट आती है और मिठास संतुलित रहती है. कुछ लोग इसमें केसर या लौंग भी डालते हैं, हालांकि पारंपरिक स्वाद हल्के मसालों के साथ ही पसंद किया जाता है.
4. 2-3 दिन बाद आता है असली स्वाद
मुरब्बा बनते ही पूरी तरह तैयार नहीं माना जाता. कांच के बर्तन में भरकर दो-तीन दिन रखने से आंवला चाशनी सोख लेता है. तब उसका रंग चमकदार और स्वाद गहरा हो जाता है. यही कारण है कि पुराने समय में मुरब्बा हमेशा पहले बनाकर रखा जाता था, अगर चाशनी बहुत पतली लगे तो हल्का पकाया जा सकता है, और ज्यादा गाढ़ी हो जाए तो थोड़ा गर्म पानी मिलाया जाता है-यह घरेलू संतुलन का आसान तरीका है.
सेहत और स्वाद का संतुलन
आंवला मुरब्बा सिर्फ मिठाई नहीं, बल्कि पारंपरिक हेल्थ टॉनिक की तरह भी खाया जाता रहा है. कई परिवारों में सुबह एक छोटा टुकड़ा खाने की आदत आज भी है. माना जाता है कि इससे पाचन सुधरता है और शरीर को ऊर्जा मिलती है. हालांकि विशेषज्ञ संतुलित मात्रा में सेवन की सलाह देते हैं क्योंकि इसमें चीनी होती है.
रसोई की पुरानी रेसिपी जब नई पीढ़ी अपनाती है, तो वह सिर्फ स्वाद नहीं बल्कि परंपरा की याद भी होती है. आंवला मुरब्बा भी ऐसा ही व्यंजन है-जिसमें घरेलू ज्ञान, धैर्य और सेहत का मेल है. सही आंवला, धीमी चाशनी और थोड़ा इंतजार-बस इतना ध्यान रखा जाए तो घर में भी वही चमकदार, स्वादिष्ट और लंबे समय तक चलने वाला मुरब्बा तैयार हो सकता है.


