India US Trade Deal | Donald Trump India Tariff | India US trade agreement | इंडिया-यूएस ट्रेड डील में बदल गया गेम, भारत का हथियार बनेगी ये एक बात, डोनाल्ड ट्रंप भी हो जाएंगे मजबूर

Date:


लोकेंद्र शर्मा

डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी राष्ट्रपति बने अभी एक साल ही पूरे हुए हैं. हालांकि इस एक साल में डोनाल्ड ट्रंप ने पूरी दुनिया में उथल-पुथल मचा रखी है. इस दौर में यह लगभग आम सी बात हो गई थी कि अमेरिका के ट्रेड पार्टनर्स पर नए-नए टैरिफ लगाने की जानकारी ट्रंप के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल की पोस्ट से मिलती थी.

ट्रंप 2.0 में टैरिफ उनकी नीतियों का एक प्रमुख एजेंडा बन चुके हैं. टैक्स से जुड़े मामलों में कार्यपालिका के अत्यधिक दखल की एक बड़ी वजह 1977 के एक पुराने कानून इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) की विवादास्पद व्याख्या रही है. टैरिफ असल में अमेरिकी नागरिकों पर लगाया जाने वाला टैक्स ही होता है.

इसी कानून के तहत अप्रैल 2025 में ट्रंप ने अपने तथाकथित ‘लिबरेशन डे’ पर भारत समेत कई देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाए थे. इसी कानून का इस्तेमाल पिछले साल एक राष्ट्रपति आदेश के जरिये भारत पर रूसी तेल आयात को लेकर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने में भी किया गया.

भारत पर लगाए गए ये टैरिफ, जो कई महीनों तक 50 प्रतिशत तक रहे, अब अमेरिका में गैरकानूनी ठहरा दिए गए हैं. फरवरी 2026 में भारत-अमेरिका के बीच एक फ्रेमवर्क ट्रेड एग्रीमेंट होने से पहले तक ये टैरिफ लागू थे. अब अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया है कि IEEPA के तहत कार्यपालिका टैरिफ नहीं लगा सकती.

क्या व्यापार समझौते से बाहर निकल सकता है भारत?

इस महीने की शुरुआत में नई दिल्ली और वॉशिंगटन ने एक ट्रेड एग्रीमेंट ‘फ्रेमवर्क’ की घोषणा की है. फिलहाल विस्तृत और ठोस व्यापार समझौते को लेकर बातचीत जारी है, जो आने वाले हफ्तों तक चलने की उम्मीद है. भारत को इस समझौते में मौजूद एक प्रावधान के आधार पर दोबारा बातचीत शुरू करनी चाहिए. इस प्रावधान में कहा गया है कि अगर किसी भी देश के तय टैरिफ में बदलाव होता है, तो दूसरा देश अपनी प्रतिबद्धताओं में संशोधन कर सकता है.

कुछ अहम बिंदुओं पर मतभेद

इस व्यापार समझौते में तीन ऐसे मुख्य मुद्दे हैं, जिन पर भारत को दोबारा बातचीत या स्पष्टीकरण की मांग करनी चाहिए.

पहला मुद्दा रूसी तेल से जुड़ा है. भारत-अमेरिका के संयुक्त बयान में रूसी तेल का कोई जिक्र नहीं है. लेकिन ट्रंप के कार्यकारी आदेश और 6 व 9 फरवरी 2026 को जारी अमेरिकी फैक्ट शीट में यह कहा गया है कि 25 प्रतिशत टैरिफ हटाने को भारत की ‘रूसी तेल खरीद बंद करने की प्रतिबद्धता’ से जोड़ा गया है. कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि भारत ने सीधे या परोक्ष रूप से रूस से तेल आयात रोकने का वादा किया है.

वहीं, भारत की ओर से जारी प्रेस रिलीज में रूसी तेल का कोई जिक्र नहीं है. विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसले राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही लिए जाएंगे.

हाल ही में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी विदेश मंत्री के बयान के बाद यह भी स्पष्ट नहीं है कि भारत को रूस से पूरी तरह तेल खरीद बंद करनी है या सिर्फ अतिरिक्त खरीद रोकनी है.

जैसा कि फ्रेमवर्क ट्रेड डील के विश्लेषण में लिखा गया है, अगर अमेरिका किसी विकासशील देश की ऊर्जा पसंद तय करने लगे, तो इसके दूरगामी और गंभीर परिणाम हो सकते हैं. इसलिए भारत को इस मुद्दे पर स्पष्टता और जरूरत पड़ने पर दोबारा बातचीत करनी चाहिए.

कृषि उत्पादों पर टैरिफ का मुद्दा

दूसरा मुद्दा अमेरिकी कृषि उत्पादों के भारत में निर्यात से जुड़े टैरिफ का है. अमेरिकी फैक्ट शीट इस पर कहीं ज्यादा व्यापक दावे करती है, जिन पर स्पष्ट सहमति जरूरी है.

तीसरा मुद्दा डिजिटल ट्रेड का है. इस पर भारत और अमेरिका के बयानों में फर्क है. अमेरिका जहां भारत से डिजिटल व्यापार की बाधाएं कम करने की बात करता है, वहीं भारत नवाचार को बढ़ावा देने के साथ-साथ नियामकीय और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सुरक्षा उपायों पर जोर देता है. संप्रभुता से जुड़े इन पहलुओं को देखते हुए भारत को अपने रुख को साझा सहमति के रूप में मान्य कराने की कोशिश करनी चाहिए.

500 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता को करना होगा नजरअंदाज

अमेरिकी उत्पादों के 500 अरब डॉलर के आयात को लेकर काफी चर्चा हुई है, लेकिन भारत को इस पर दोबारा बातचीत करने की जरूरत नहीं है. इसकी वजह यह है कि अमेरिका ने फैक्ट शीट में ‘भारत की प्रतिबद्धता’ की भाषा को कमजोर करते हुए ‘भारत का इरादा’ कर दिया है. ऐसे बड़े आंकड़े अक्सर सुर्खियां बटोरने के लिए होते हैं और इन पर सख्त अमल का कोई ठोस तंत्र नहीं होता.

ट्रंप के सीमित विकल्पों का फायदा

IEEPA के रास्ते बंद होने के बाद भी ट्रंप के पास कुछ विकल्प बचे हैं. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उन्होंने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत पहले 10 प्रतिशत और फिर 15 प्रतिशत टैरिफ लगाए, लेकिन ये सिर्फ 150 दिनों के लिए हैं. ये टैरिफ सभी देशों पर समान रूप से लागू होते हैं और IEEPA की तरह मनमाने नहीं हो सकते.

150 दिनों के बाद ट्रंप को इसके लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी लेनी होगी. संभव है कि ट्रंप कोई और रास्ता निकालने की कोशिश करें, लेकिन तब भी टैरिफ 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होंगे और भेदभाव रहित होंगे. इससे ट्रंप की सौदेबाजी की ताकत कुछ हद तक कमजोर होगी.

इसके अलावा ट्रंप 1962 के ट्रेड एक्सपैंशन एक्ट की धारा 232 या 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 का भी इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन इनके तहत टैरिफ लगाने से पहले जांच जरूरी होती है. यानी भविष्य में ऐसे फैसले ज्यादा धीमे और सोच-समझकर लिए जाएंगे.

चुनावी साल में इंतजार करना ही समझदारी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता के लिए गठित भारतीय टीम ने अपनी वांशिगटन यात्रा टाल दी है, जो एक सही कदम है. भारत को संयुक्त बयान में मौजूद दोबारा बातचीत के प्रावधान का इस्तेमाल कर मतभेद सुलझाने चाहिए.

लेकिन अमेरिका की बदली हुई घरेलू कानूनी स्थिति को देखते हुए यह भी संभव है कि भारत इस साल होने वाले मिड-टर्म चुनावों तक अंतिम और व्यापक व्यापार समझौते पर सहमति देने में जल्दबाजी न करे. अगर चुनावों में ट्रंप को झटका लगता है, तो कांग्रेस की भूमिका मजबूत होगी और ट्रंप की टैरिफ को लेकर ताकत कम हो सकती है.

(लोकेंद्र शर्मा तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के हाई-टेक जियोपॉलिटिक्स प्रोग्राम में स्टाफ रिसर्च एनालिस्ट हैं.)

इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, और इस पब्लिकेशन का नज़रिया नहीं दिखाते हैं.



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related