Ishita Dutta Parenting Tips: इशिता दत्ता ने बताया टॉडलर मेल्टडाउन संभालने का तरीका

Date:


What Is Good Parenting: हर कपल के पेरैंटिंग का तरीका अलग-अलग होता है. लेकिन ये समझना जरूरी है कि बच्चों की सही परवरिश के लिए अपने कंफर्ट से निकलना जरूरी है. आज के समय में पेरैंटिंग जितनी खूबसूरत है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी है, खासकर तब जब बच्चा दो से तीन साल की उम्र में होता है. यह वह दौर होता है जब बच्चा अपनी पहचान बनाने लगता है, अपनी बात मनवाना चाहता है और हर चीज खुद से करने की जिद करता है. ऐसे में उसका गुस्सा, रोना, और जिद माता-पिता के लिए रोजमर्रा की परीक्षा बन जाती है. इसी कड़ी में एक्ट्रेस इशिता दत्ता ने अपना पैरेंटिंग एक्सपीरियंस शेयर किया है.

उन्होंने बताया कि वह अपने ढाई साल के बेटे वायु को कैसे संभालती हैं और कैसे उन्होंने यह सीखा कि हर दिन खुद को परफेक्ट पैरेंट साबित करना जरूरी नहीं है. इशिता दत्ता ने कहा, “मेरा बेटा वायु ढाई साल का है और इस उम्र में उसके स्वभाव में बड़े-बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं. अब वह हर काम खुद करना चाहता है, चाहे वह खुद खाना खाना हो, कपड़े पहनना हो, या फिर जूते पहनना हो. इस उम्र में बच्चे आत्मनिर्भर बनने की शुरुआत करते हैं.”

टॉडलर मेल्टडाउन
उन्होंने आगे कहा, ”समस्या तब होती है जब बच्चा सब कुछ कर नहीं पाता और कोशिशें नाकाम होती हैं. इससे वह चिड़चिड़े रहने लगते हैं और वही चिढ़ धीरे-धीरे गुस्से और तेज रोने में बदल जाती है. इसे टॉडलर मेल्टडाउन कहा जाता है.”

इशिता ने कहा, ”इस दौर में मैंने हर तरीका आजमाया. कभी मैं सख्त हुई, कभी चिल्लाई, कभी बहुत प्यार से समझाया, और कभी-कभी तो बेटे के साथ खुद भी रो पड़ी. लेकिन मैंने यह समझा कि जब बच्चे का मेल्टडाउन शुरू हो जाता है, तब कोई भी तरीका तुरंत काम नहीं करता. उस समय न डांटना असर करता है और न ही समझाना. ऐसे में सबसे जरूरी होता है शांत रहना और बच्चे को समय देना.”

उन्होंने कहा, ”जब वायु बहुत ज्यादा परेशान होता है, तो मैं उसके पास बैठ जाती हूं. मैं उसे बस इतना कहती हूं कि सब ठीक है और मम्मा यहीं है. मैं उसे शांत होने का पूरा समय देती हूं. उस पल बच्चे को समाधान नहीं, बल्कि भरोसे की जरूरत होती है.”

इशिता के पेरैंटिंग टिप्स
उन्होंने कहा, ”बच्चों पर ऑर्डर न चलाएं, बल्कि उन्हें विकल्प दें. जैसे खाने के समय यह पूछना कि मम्मा खिलाएं या खाना छोटे टुकड़ों में उनके सामने परोसें।. अलमारी खोलने की बजाय दो कपड़े निकालकर बच्चे से पूछना कि वह कौन-सा पहनना चाहता है. इससे बच्चे को लगता है कि उसकी बात सुनी जा रही है और वह खुद को स्वतंत्र महसूस करता है, जबकि होता ये है कि कंट्रोल अब भी माता-पिता के हाथ में रहता है.”



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related