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JEE Main Topper: जेईई मेन में 100 परसेंटाइल से IIT की सीट पक्की हो जाती है क्या? जनवरी सेशन में जेईई मेन टॉपर करने वाले कई स्टूडेंट्स अप्रैल में दोबारा परीक्षा देना चाहते हैं. समझिए इसकी वजह क्या है.
JEE Main Topper: जेईई मेन जनवरी सेशन के कई टॉपर अप्रैल में फिर से परीक्षा देते हैं
नई दिल्ली (Why JEE Main Topper Retake Exam). जेईई मेन के पहले सेशन का रिजल्ट आते ही हर तरफ परसेंटाइल का शोर मच जाता है. 100 परसेंटाइल स्कोर करने वालों के घरों में जश्न का माहौल है और सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें चमक रही हैं. लेकिन इस चमक-धमक के पीछे गहरा सस्पेंस भी छिपा है. आम आदमी को लगता है कि अगर किसी ने जेईई मेन में टॉप कर लिया है तो अब तो वह सीधे आईआईटी की दहलीज पर खड़ा है, जबकि हकीकत इससे कोसों दूर है.
जेईई मेन टॉपर दोबारा परीक्षा क्यों देते हैं?
बिहार के गयाजी निवासी शुभम की बड़ी बहन आईआईटी पटना की स्टूडेंट है. शुभम आईआईटी बॉम्बे से बीटेक करना चाहते हैं. जेईई मेन में 100 परसेंटाइल (295 अंक) होने के बावजूद वह अप्रैल में फिर से परीक्षा देंगे. दरअसल जेईई मेन टॉपर्स के लिए अप्रैल का एग्जाम सिर्फ स्कोर सुधारने का जरिया नहीं, बल्कि खुद को उस अग्निपरीक्षा के लिए तैयार रखने का एक तरीका है, जिसे जेईई एडवांस्ड कहते हैं. जानिए कि आखिर क्यों ये जीनियस स्टूडेंट्स आराम करने के बजाय दोबारा परीक्षा के मैदान में उतरना चाहते हैं.
जेईई मेन टॉपर्स के लिए भी आईआईटी अभी दूर है!
कई लोग सोचते हैं कि जेईई मेन टॉपर को सीधे आईआईटी में एडमिशन मिल जाता है. सच यह है कि जेईई मेन केवल एनआईटी, IIIT और अन्य सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों (GFTIs) में एडमिशन का रास्ता है. आईआईटी में जाने के लिए जेईई एडवांस्ड परीक्षा देनी होती है. जेईई मेन तो बस ‘एलिजिबिलिटी टेस्ट’ है.. यानी अगर आप टॉप 2.5 लाख छात्रों में आते हैं, तभी आप एडवांस्ड के लिए क्वॉलिफाई करते हैं. इसलिए जेईई मेन में 100 परसेंटाइल लाने वाला छात्र भी अभी सिर्फ क्वॉलिफाइड है, ‘एडमिटेड’ नहीं.
टॉपर क्यों देना चाहते हैं दोबारा परीक्षा?
जेईई मेन में 100 परसेंटाइल स्कोर होने पर भी अगले सेशन में फिर से परीक्षा देने के 3 मुख्य कारण होते हैं:
- ऑल इंडिया रैंक (AIR) का गणित: जेईई मेन की फाइनल रैंक दोनों सत्रों (जनवरी और अप्रैल) के बेस्ट स्कोर के आधार पर बनती है. अगर किसी छात्र का जनवरी में स्कोर अच्छा है, लेकिन उसे लगता है कि अप्रैल में ज्यादा छात्र बैठेंगे और ‘टाई-ब्रेकिंग’ रूल (उम्र, गणित के अंक आदि) में वह पिछड़ सकता है तो वह अपनी रैंक को ज्यादा पुख्ता करने के लिए दोबारा परीक्षा देता है.
- प्रैक्टिस और रिदम: जेईई एडवांस्ड परीक्षा मई के अंत या जून में होती है. जनवरी के बाद लंबा गैप स्टूडेंट को सुस्त बना सकता है. अप्रैल की परीक्षा देने से उम्मीदवार परीक्षा के माहौल में बना रहता है और उसका टाइम मैनेजमेंट सटीक रहता है.
- कॉन्फिडेंस बूस्टर: कई उम्मीदवार जेईई मेन को मॉक टेस्ट की तरह लेते हैं. वे देखना चाहते हैं कि क्या वे अपनी परफॉरमेंस को दोबारा दोहरा सकते हैं. अगर वे फिर से टॉप करते हैं तो जेईई एडवांस्ड के लिए उनका कॉन्फिडेंस सातवें आसमान पर होता है.
एडवांस्ड बनाम मेन: लेवल का अंतर
जेईई मेन में सारा खेल स्पीड और एक्यूरेसी का है, वहीं जेईई एडवांस्ड में कॉन्सेप्ट की गहराई और मुश्किल सवालों को हल करने की क्षमता परखी जाती है. जेईई मेन टॉपर्स जानते हैं कि अगर वे अप्रैल सेशन स्किप करते हैं तो वे कॉम्पिटीशन की उस ‘हीट’ से बाहर हो सकते हैं जो उन्हें आईआईटी बॉम्बे या आईआईटी दिल्ली की कंप्यूटर साइंस सीट तक पहुंचाएगी.
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