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किसान भाई आड़ू की फसल से मोटा मुनाफा कमाना है, तो फरवरी और मार्च के ये दो महीने बागवानों के लिए सबसे कीमती हैं. अक्सर किसान ज्यादा फल के लालच में बड़ी गलती कर बैठते हैं, जिससे फलों का साइज छोटा रह जाता है और मंडी में भाव नहीं मिलता. जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक ने आड़ू की चमक और मिठास बढ़ाने के लिए कुछ खास वैज्ञानिक तरीके साझा किए हैं. ये तरीके आपकी फसल की क्वालिटी और पैदावार दोनों को रिकॉर्ड स्तर पर ले जा सकते हैं.
फरवरी का महीना आते ही आडू के बागों में रौनक लौट आती है. यह वह समय है जब पेड़ों पर फूल खिलते हैं और छोटे-छोटे फल बनना शुरू होते हैं. आडू की फसल से मोटा मुनाफा कमाने के लिए सिर्फ फल आना काफी नहीं है, बल्कि फलों का साइज, रंग और मिठास भी मायने रखती है. कई बार किसान भाई इस नाजुक समय में छोटी गलतियां कर बैठते हैं जिससे फल गिर जाते हैं या छोटे रह जाते हैं. आइए जानते हैं डॉ. पुनीत कुमार पाठक की वे सलाहें जिनसे आप अपने बाग की तस्वीर बदल सकते हैं.
आडू में जब फूल आ रहे हों और छोटे फल बन रहे हों, उस समय मिट्टी में सही नमी का होना बहुत जरूरी है. बागवानों को इस बात का खास ख्याल रखना चाहिए कि मिट्टी न तो पत्थर जैसी सूखे और न ही उसमें पानी का जमाव हो. नमी कम होने से फूल और नन्हे फल समय से पहले गिर सकते हैं. वहीं बहुत ज्यादा पानी जड़ों को सड़ा सकता है. इसलिए हल्की-हल्की सिंचाई एक निश्चित अंतराल पर करते रहें ताकि पेड़ों को जरूरी पानी मिलता रहे.
जिला उद्यान अधिकारी डॉ. पुनीत कुमार पाठक ने बताया कि फल सेट होने के तुरंत बाद पेड़ों को अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत होती है. फरवरी के अंत में जब फल टिकने लगें, तब कैल्शियम नाइट्रेट और बोरोन का छिड़काव करना बहुत फायदेमंद रहता है. बोरोन फूलों की ताकत बढ़ाता है जिससे फल गिरते नहीं हैं, वहीं कैल्शियम फलों की स्किन को चमकदार और वजनदार बनाता है. इससे बाजार में आपके आडू का भाव दूसरों से बेहतर मिलता है.
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आडू में फलों का बनना पूरी तरह परागण (Pollination) पर टिका होता है. इसमें मधुमक्खियां और मित्र कीट बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं. जब बाग में फूल खिले हों, तब किसी भी तेज कीटनाशक का छिड़काव न करें, क्योंकि इससे मधुमक्खियां मर जाती हैं. अगर स्प्रे बहुत जरूरी हो, तो उसे शाम के समय ही करें जब मधुमक्खियां अपने छत्ते में लौट चुकी हों. जितनी ज्यादा मधुमक्खियां होंगी, उतनी ही ज्यादा फसल होगी.
अक्सर किसानों को लगता है कि पेड़ पर जितने ज्यादा फल होंगे, उतनी ज्यादा कमाई होगी. लेकिन हकीकत में, अगर एक ही टहनी पर बहुत ज्यादा फल लदे हों, तो पेड़ सबको बराबर पोषण नहीं दे पाता और फल छोटे रह जाते हैं. जब फल चने के दाने के बराबर हो जाएं, तो घने फलों को हाथ से तोड़कर हटा दें. इससे बचे हुए फलों को ज्यादा खुराक मिलेगी और वे बड़े, रसीले और मीठे तैयार होंगे.
फरवरी और मार्च के बढ़ते तापमान के साथ ‘लीफ कर्ल’ (पत्तियों का मुड़ना) और एफिड्स जैसे कीटों का खतरा बढ़ जाता है. अगर पत्तियां मुड़ने लगें, तो वे धूप से भोजन नहीं बना पातीं, जिसका सीधा असर फलों के विकास पर पड़ता है. जैसे ही ऐसे लक्षण दिखें, एक्सपर्ट की सलाह पर सही फंगीसाइड का छिड़काव करें. स्वस्थ पत्तियां ही आडू को मीठा बनाने के लिए जरूरी शर्करा पैदा करती हैं.
जैसे-जैसे धूप तेज होती है, जमीन से नमी भाप बनकर उड़ने लगती है. इसे रोकने के लिए पेड़ों के तनों के चारों ओर सूखी घास या पुआल की एक परत बिछा दें, जिसे मल्चिंग कहते हैं. यह तकनीक मिट्टी के तापमान को एक जैसा बनाए रखती है और जमीन के अंदर मौजूद मित्र जीवाणुओं को सक्रिय रखती है. मल्चिंग न केवल पानी बचाती है, बल्कि फलों के सही विकास में भी बहुत मदद करती है.
फलों के पकने के लिए सूरज की रोशनी बहुत जरूरी है. अगर पेड़ों के बीच में फालतू और घनी टहनियां बढ़ रही हैं, तो उन्हें काट कर हटा दें ताकि धूप अंदर के गुच्छों तक पहुंच सके. सही धूप लगने से आडू का रंग चटख लाल आता है और उसकी मिठास भी बढ़ जाती है. याद रखें, फल दिखने में जितना सुंदर और लाल होगा, मंडी में उतनी ही तेजी से बिकेगा और आपको मुनाफा देगा.


