दुनिया की नजरें इस वक्त मिडिल ईस्ट पर टिकी हैं और वहां के हालात किसी बारूद के ढेर से कम नहीं हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर मिलिट्री स्ट्राइक की आखिरी वॉर्निंग दे चुके हैं. अमेरिकी युद्धपोत अपनी पोजीशन ले चुके हैं और पूरा इलाका ‘वॉर जोन’ में तब्दील होने की कगार पर है. ऐसे खतरनाक वक्त में, जब दुनिया भर के नेता इस इलाके से दूरी बनाने की सोच रहे हों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार यानी 25 फरवरी को इजरायल पहुंच रहे हैं.
अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध शुरू होने के बाद यह पीएम मोदी की पहली इजरायल यात्रा है, और कुल मिलाकर 2017 के बाद दूसरी. दिलचस्प बात यह है कि इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू की भारत यात्रा इससे पहले तीन बार टल चुकी है. इसके बाद पीएम मोदी ने उनका इंतजार करने के बजाय खुद इस ‘वॉर जोन’ में जाने का जो फैसला किया है, उसने वैश्विक कूटनीति में एक नई बहस छेड़ दी है. रक्षा और सामरिक मामलों के जानकार इसे अभूतपूर्व बता हैं. और कह रहे कि पीएम मोदी का यह इजरायल जाना कूटनीति में भारत की एक नई रेड लाइन खींचने जैसा है.
‘यह एक स्ट्रैटेजिक सिग्नल है’
ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, ठीक उस वक्त इजरायल की धरती पर उतरना, जब अमेरिकी युद्धपोत अपनी पोजीशन ले रहे हैं, यह बताता है कि भारत मिडिल ईस्ट की स्थिरता में एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावशाली स्टेक होल्डर की भूमिका में है. हाई मिलिट्री अलर्ट के इस दौर में इजरायली संसद को संबोधित करना इस बात पर और मुहर लगाता है कि भारत क्षेत्रीय अस्थिरता से डरने या पीछे हटने वाला नहीं है.
भारत ने खत्म किया ‘वीटो’
कई विशेषज्ञों ने इसे भारत की कूटनीति का मास्टरस्ट्रोक करार दिया है. उन्हें लगा रहा कि यह तुर्की-पाकिस्तान जैसे देशों को मैसेज है तो ईरान को भरोसा भी, जरूरत पड़ने पर भारत उसके साथ है. इसके पीछे एक्सपर्ट 4 बड़े फैक्टर बता रहे हैं.
- अरब-इजरायल साथ साथ: विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने अब अपनी विदेश नीति में किसी तीसरे देश के ‘वीटो’ को पूरी तरह खत्म कर दिया है. महज़ चार हफ्ते पहले ही भारत ने अरब देशों के विदेश मंत्रियों की मेजबानी की थी. और अब सीधे इजरायल का दौरा करके भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह अपने संबंधों को संतुलित रखना जानता है.
- टू स्टेट सॉल्यूशन पर कायम: एक्सपर्ट्स यह भी याद दिला रहे हैं कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले की भारत ने सबसे पहले और कड़ी निंदा की थी. लेकिन साथ ही, भारत फिलिस्तीन के लिए ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ के अपने स्टैंड पर भी मजबूती से कायम है. यह दौरा बताता है कि भारत इजरायल के साथ खड़ा है, लेकिन अपनी शर्तों पर.
- ग्लोबल प्लेयर की भूमिका: एक्स पर चर्चा इस बात की भी है कि ट्रंप के गाजा पीस प्लान और वाशिंगटन में हुए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक में भारत का ऑब्जर्वर के तौर पर शामिल होना यह साबित करता है कि भारत अब सिर्फ एक दर्शक नहीं, बल्कि शांति बहाली करने में एक ग्लोबल प्लेयर है.
नेतन्याहू के लिए संजीवनी
नेतन्याहू के लिए पीएम मोदी का यह दौरा किसी राजनीतिक संजीवनी से कम नहीं है. इजरायल इस वक्त हमास और ईरान के साथ मोर्चों पर उलझा ही है, देश के भीतर भी नेतन्याहू सरकार भारी विरोध का सामना कर रही है. ऐसे में मोदी जैसे विशाल और लोकप्रिय वैश्विक नेता की मेजबानी करना नेतन्याहू को घरेलू राजनीति में एक बहुत बड़ा बूस्ट देता है.
‘हेक्सागन ऑफ अलायंस’
नेतन्याहू पीएम मोदी के इजरायल दौरे को दुनिया के सामने अपनी कूटनीतिक जीत के तौर पर पेश कर रहे हैं. यरुशलम इस यात्रा को एक सुपर पॉवर के साथ अलायंस के रूप में दिखा रहा है. नेतन्याहू ने हाल ही में अपने प्रस्तावित हेक्सागन ऑफ अलायंस का ज़िक्र किया था. इस 6 देशों के इजरायल, ग्रीस, साइप्रस, भारत और कुछ अरब देश शामिल हैं. ग्रीस और साइप्रस वो देश हैं, जो भारत को बुरी नजर से देखने वाले तुर्की के दुश्मन हैं. नेतन्याहू का मानना है कि यह गठबंधन क्षेत्र में उभरते हुए कट्टरपंथी सुन्नी और शिया गुटों का मुकाबला करने के लिए जरूरी है.


