PM Modi Israel visit | Netanyahu Hexagon Of Alliances | बेंजामिन नेतन्याहू का ये ‘गठबंधन का षट्कोण’ क्या है, क्यों भारत का साथ चाहता है इजरायल, जानें अंदर की बात

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजरायल दौरे की शुरुआत के साथ ही पश्चिम एशिया की कूटनीति में नई हलचल देखने को मिल रही है. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस दौरे को ‘कट्टरपंथी ताकतों’ के खिलाफ एक नए रणनीतिक गठजोड़ की दिशा में बड़ा कदम बताया है. नेतन्याहू के मुताबिक, भारत-इजरायल रिश्ते अब केवल द्विपक्षीय सहयोग तक सीमित नहीं रहे, बल्कि एक व्यापक क्षेत्रीय संरचना की ओर बढ़ रहे हैं.

नेतन्याहू ने भारत को ‘वैश्विक शक्ति’ करार देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी उनके ‘खास दोस्त’ हैं और दोनों देशों के रिश्ते पहले से कहीं अधिक मजबूत हुए हैं. उन्होंने दावा किया कि यह साझेदारी मध्य पूर्व और उसके आसपास एक ऐसे गठबंधन का रूप ले सकती है, जो साझा चुनौतियों के खिलाफ सामूहिक जवाब देने में सक्षम होगा.

क्या है ‘गठबंधन का षट्कोण’?

इजरायली प्रधानमंत्री ने जिस ‘हेक्सागन ऑफ अलायंस’ यानी गठबंधन के षट्कोण का जिक्र किया, उसमें भारत के अलावा अरब देश, अफ्रीकी देश, भूमध्यसागरीय क्षेत्र के देश जैसे ग्रीस और साइप्रस के अलावा एशिया के कुछ अन्य देश शामिल बताए जा रहे हैं. इस अवधारणा को IMEC (India-Middle East-Europe Economic Corridor) से जोड़ा जा रहा है, जिसका उद्देश्य कनेक्टिविटी बढ़ाकर आर्थिक विकास को गति देना है.

नेतन्याहू के अनुसार, यह गठबंधन उन देशों का समूह होगा जो ‘वास्तविकताओं, चुनौतियों और लक्ष्यों’ पर सहमत हैं और शिया तथा सुन्नी ध्रुवों जैसे कट्टरपंथी एक्सिस के मुकाबले साझा रणनीति तैयार कर सकते हैं. उनका कहना है कि अलग-अलग दृष्टिकोण रखने के बावजूद यह सहयोग दीर्घकालिक स्थिरता और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है.

भारत की भूमिका कितनी अहम?

भारत-इजरायल संबंधों को प्रधानमंत्री मोदी ने भरोसे और शांति की साझा प्रतिबद्धता पर आधारित बताया है, लेकिन नई दिल्ली पारंपरिक रूप से किसी सख्त गुटीय राजनीति से दूरी बनाए रखती आई है. भारत के चीन, रूस और अमेरिका तीनों के साथ समानांतर संबंध हैं, वहीं ईरान के साथ भी उसके पुराने और गहरे रिश्ते हैं. इसके साथ ही भारत सऊदी अरब के साथ रणनीतिक सहयोग का विस्तार कर रहा है.

अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, किंग्स कॉलेज लंदन के सुरक्षा अध्ययन के एसोसिएट प्रोफेसर एंड्रियास क्रिग कहते हैं कि नेतन्याहू की यह पहल क्षेत्रीय ध्रुवीकरण को और कठोर बना सकती है. इससे ईरान, तुर्किये जैसे इजरायल के प्रतिद्वंद्वियों को ‘घेराबंदी’ का नैरेटिव मिल सकता है और कुछ संभावित साझेदार इजरायल के बहुत करीब दिखने से हिचक सकते हैं. उनके अनुसार, भारत की प्राथमिकताएं रक्षा, तकनीक और व्यापार हैं, न कि इजरायल की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं.

पीएम मोदी का दूसरा इजरायल दौरा

प्रधानमंत्री मोदी 25 से 26 फरवरी तक दो दिवसीय इजरायल यात्रा पर हैं. यह उनका दूसरा दौरा है; इससे पहले जुलाई 2017 में वे इजरायल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे. इस यात्रा के दौरान वे यरुशलम में एक इनोवेशन इवेंट में हिस्सा लेंगे और याद वाशेम का दौरा करेंगे.

दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के इजरायली संसद क्नेसेट को संबोधित करने की भी संभावना है, जो दोनों लोकतांत्रिक देशों के बीच राजनीतिक गर्मजोशी का प्रतीक माना जा रहा है. इससे पहले 2015 में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने केनेस्सेट को संबोधित किया था. प्रधानमंत्री की इजरायल के राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग से भी मुलाकात तय है.

प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि वे इस यात्रा के दौरान होने वाली चर्चाओं को लेकर उत्साहित हैं और भारत इजरायल के साथ भरोसे, नवाचार और शांति व प्रगति की साझा प्रतिबद्धता को बेहद महत्व देता है.

पीएम मोदी का इजरायल दौरा क्यों खास?

प्रधानमंत्री के इस दौरे से पहले दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संपर्क तेज रहे हैं. विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल हाल के महीनों में इजरायल का दौरा कर चुके हैं, जबकि कई इजरायली मंत्री भारत आए हैं. नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में इजरायल का बड़ा सरकारी और निजी प्रतिनिधिमंडल भी शामिल हुआ था, जो उभरती तकनीकों खासतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में बढ़ते सहयोग का संकेत है.

कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा भारत-इजरायल संबंधों को नई ऊंचाई देने के साथ-साथ पश्चिम एशिया की रणनीतिक तस्वीर पर भी दूरगामी असर डाल सकता है.



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