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Fish Farming Business: अक्सर लोग एक सुरक्षित सरकारी या कॉर्पोरेट नौकरी के लिए वर्षों संघर्ष करते हैं, लेकिन शिवहर जिले के हथसार गांव के रूपेश सिंह की कहानी इसके उलट है. कभी आईसीआईसीआई जैसे प्रतिष्ठित बैंक में बैठकर लोगों के लोन पास करने वाले रूपेश आज खुद एक सफल उद्यमी बन चुके हैं. उन्होंने बंद कमरे की एसी वाली नौकरी को अलविदा कहकर धूप और पानी के बीच अपना भविष्य तलाशा. आज वे मछली पालन के जरिए न केवल बैंक से दोगुनी कमाई कर रहे हैं, बल्कि इलाके के युवाओं के लिए एक मिसाल बन गए हैं.
रूपेश सिंह का सफर फाइनेंस सेक्टर की नामी कंपनियों से शुरू हुआ था. करियर की शुरुआत में सब कुछ सही था, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि वे एक बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहे हैं. कॉर्पोरेट सेक्टर के दबाव और अपने परिवार से दूर रहने की मजबूरी ने उन्हें कुछ अपना करने के लिए प्रेरित किया. रूपेश बताते हैं कि बैंक में रहते हुए वे दूसरों को उनके सपनों के लिए कर्ज बांटते थे, लेकिन एक दिन उन्होंने खुद के सपनों पर निवेश करने का फैसला किया. इसी सोच ने उन्हें बैंक की फाइलों से निकालकर अपने पैतृक गांव के तालाबों तक पहुंचा दिया.
मछली पालन के क्षेत्र में कदम रखने का विचार रूपेश को अचानक नहीं आया. शुरुआत में उन्होंने अपनी जमीन स्थानीय सहनी समाज के लोगों को मछली पालन के लिए किराये पर दी थी. जब उन्होंने करीब से देखा कि कैसे पार पारंपरिक तरीके से भी लोग इस काम में अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं, तो उन्होंने इसे वैज्ञानिक ढंग से करने की ठानी. लगभग 3 एकड़ की जमीन पर फैले इस प्रोजेक्ट में ढाई एकड़ में तालाब बनाए गए हैं. पिछले एक साल की कड़ी मेहनत और प्रशिक्षण के बाद, रूपेश ने पारंपरिक मछली पालन को एक आधुनिक व्यवसाय का रूप दे दिया है.
इस व्यवसाय की सबसे खास बात इसकी प्रॉफिट मार्जिन है. रूपेश ने तालाब में बीज डालने पर लगभग 1.25 से 1.5 लाख रुपये खर्च किए. भोजन और रखरखाव का सालाना खर्च भी लगभग इतना ही रहा. लेकिन जब परिणाम सामने आए, तो वे चौंकाने वाले थे. मात्र 6 महीने के चक्र में ही उनकी आय ₹10 लाख से ₹11 लाख के बीच पहुंच गई. रूपेश का कहना है कि यह उनकी बैंक की नौकरी के पैकेज से कहीं ज्यादा है. सबसे बड़ी बात यह है कि इस काम में उन्हें मानसिक शांति और परिवार के साथ रहने का सुख भी मिल रहा है.
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आज रूपेश न केवल खुद आत्मनिर्भर हैं, बल्कि वे दूसरों को भी रोजगार दे रहे हैं. वर्तमान में उनके पास 3 मजदूर नियमित रूप से कार्यरत हैं, जो तालाबों की देखरेख और मछलियों को चारा देने का काम संभालते हैं. खास बात यह है कि रूपेश ने अब तक किसी सरकारी सब्सिडी का सहारा नहीं लिया है, हालांकि वे अगले सत्र से सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आवेदन करने की तैयारी में हैं. उनका यह कदम गांव के उन युवाओं के लिए एक संदेश है जो रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करते हैं.
रूपेश सिंह की सफलता यह साबित करती है कि अगर सही सोच और मेहनत हो, तो अपनी मिट्टी में भी सोना उगाया जा सकता है. वे आज के युवाओं से अपील करते हैं कि खेती और मत्स्य पालन को छोटा न समझें. यदि इसे वैज्ञानिक तरीके और प्रबंधन के साथ किया जाए, तो यह किसी भी सफेदपोश नौकरी से बेहतर विकल्प है. शिवहर के इस मछली मित्र ने यह दिखा दिया है कि सफलता का रास्ता केवल दफ्तरों की फाइलों से होकर नहीं, बल्कि गांव की मेड़ों और तालाबों की लहरों से भी होकर गुजरता है.


