परंपरा, स्वाद और रोज़गार, सूर्यकुंड धाम का मेला बचा रहा है सिलबट्टे की विरासत

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तेजी से बदलते समय और आधुनिक रसोई उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच जहां सिलबट्टा धीरे-धीरे बाजार से गायब होता जा रहा है, वहीं झारखंड के हजारीबाग जिले के बरकट्ठा प्रखंड स्थित प्रसिद्ध सूर्यकुंड धाम में यह परंपरा आज भी जीवंत नजर आती है. सालाना मेले के दौरान यहां दूर-दराज से आए कारीगर और व्यापारी अपने हाथों से बने सिलबट्टे लेकर पहुंचते हैं, जो न सिर्फ पारंपरिक कारीगरी की मिसाल हैं, बल्कि देसी स्वाद और संस्कृति को भी आज की पीढ़ी से जोड़ने का काम कर रहे हैं. रिपोर्ट- रूपांशु चौधरी

तेजी से बदलते समय और आधुनिक तकनीक के दौर में जहां रसोई के पारंपरिक उपकरण इतिहास के पन्नों में सिमटते जा रहे हैं, वहीं सिलबट्टा भी धीरे-धीरे बाजार से गायब होता नजर आ रहा है. मिक्सर-ग्राइंडर ने भले ही लोगों की जिंदगी को आसान बना दिया हो, लेकिन सिलबट्टे पर पीसे गए मसालों और चटनियों का स्वाद आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है.

यही कारण है कि आज भी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग सिलबट्टे का उपयोग कर रहे हैं और इसे अपनी परंपरा से जोड़कर देखते हैं.शहरी इलाकों के बाजारों में जहां सिलबट्टा अब बहुत कम देखने को मिलता है.

वहीं, झारखंड के हजारीबाग जिले के बरकट्ठा प्रखंड स्थित प्रसिद्ध सूर्यकुंड धाम में यह परंपरा आज भी जीवंत नजर आती है. सूर्यकुंड धाम में लगने वाला सालाना मेला न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह पारंपरिक कारीगरी और ग्रामीण संस्कृति को भी संजोए हुए है. इस मेले में दूर-दराज के इलाकों से सिलबट्टा बेचने वाले व्यापारी खास तौर पर पहुंचते हैं.

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इस वर्ष सूर्यकुंड धाम के वार्षिक मेले में करीब आधा दर्जन सिलबट्टा व्यापारी अपने पारंपरिक उत्पादों के साथ पहुंचे हैं. इनमें से एक व्यापारी राहुल केसरी ने बताया कि उनके परिवार में पिछले 80 वर्षों से सिलबट्टा बनाने और बेचने का काम किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि सिलबट्टा एक खास काले पत्थर से तैयार किया जाता है, जिसे पहले काटा जाता है और फिर उस पर विशेष डिजाइन बनाई जाती है. इन डिजाइनों का उद्देश्य यह होता है कि मसाले या चटनी पीसते समय फिसले नहीं और स्वाद पूरी तरह निखर कर आए.

राहुल केसरी ने बताया कि इस बार उनके पास 200 रुपये से लेकर 800 रुपये तक के सिलबट्टे उपलब्ध हैं. छोटे, मध्यम और बड़े आकार के सिलबट्टों के साथ-साथ ओखली और मूसल भी बिक्री के लिए लाए गए हैं. उन्होंने कहा कि वे साल भर अलग-अलग जगहों पर लगने वाले मेलों और बाजारों में जाकर अपने उत्पादों की बिक्री करते हैं.

हालांकि बदलते दौर का असर इस पारंपरिक व्यवसाय पर भी साफ दिखाई दे रहा है. इलेक्ट्रिक मिक्सर के बढ़ते चलन के कारण सिलबट्टे की मांग में काफी कमी आई है. इसके बावजूद आज भी कई लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक तरीके से खाना बनाना पसंद करते हैं और हर घर में सिलबट्टा रखना जरूरी मानते हैं.

व्यापारियों का कहना है कि सिलबट्टे पर पीसी चटनी और मसालों का स्वाद बेहद लाजवाब होता है, जो मिक्सर में तैयार किए गए मसालों से बिल्कुल अलग होता है. यही वजह है कि स्वाद के शौकीन लोग आज भी सिलबट्टे को प्राथमिकता देते हैं. सूर्यकुंड धाम का यह मेला न केवल व्यापार का माध्यम है, बल्कि यह हमारी पुरानी परंपराओं और संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का भी काम कर रहा है.

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