Last Updated:
West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के रिविजन का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शीर्ष अदालत में खुद पेश होकर अपना पक्ष रख चुकी हैं, पर जो काम होना चाहिए था, वो अभी तक नहीं हुआ है. रिविजन का काम पूरा न होने पर अब CJI जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने संविधान के तहत दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए बड़ा फैसला दिया है.
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए बड़ा आदेश दिया है. (फाइल फोटो)
West Bengal SIR: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अभूतपूर्व कदम उठाते हुए राज्य में न्यायिक अधिकारियों (Judicial Officers) की तैनाती का आदेश दिया है. ये अधिकारी मतदाता सूची में नाम शामिल करने से जुड़े दावों और आपत्तियों का निपटारा करेंगे, ताकि प्रक्रिया को तेजी से पूरा किया जा सके. अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि रिविजन का काम समय पर पूरा नहीं हुआ तो ममता बनर्जी की सरकार को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.
CJI जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत यह असाधारण हस्तक्षेप राज्य सरकार और Election Commission of India के बीच भरोसे की कमी और सहयोग के अभाव के कारण उत्पन्न असाधारण स्थिति में किया गया है. अदालत ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार को भी चेताया कि रिविजन प्रोसेस में देरी के परिणामों को समझना होगा. बेंच ने राज्य सरकार की आपत्तियों को खारिज करते हुए निर्वाचन आयोग को 28 फरवरी तक संशोधित मतदाता सूची का 95 प्रतिशत हिस्सा प्रकाशित करने की अनुमति दे दी. ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, शेष दावों का निपटारा न्यायिक अधिकारियों की मदद से बाद में किया जाएगा. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में नाम शामिल करने संबंधी दावों पर अंतिम निर्णय न्यायिक अधिकारी ही करेंगे, न कि केवल निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO). हालांकि, पश्चिम बंगाल की तरफ से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी इसके विरोध में दलील देते रहे, सीजेआई की अगुआई वाली बेंच ने उनकी एक न सुनी.
ज्यूडिशियल ऑफिसर्स को व्यापक अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR प्रक्रिया के दौरान न्यायिक अधिकारियों द्वारा दिए आदेशों को शीर्ष अदालत के आदेश के समान माना जाएगा और पुलिस अधीक्षक और जिला प्रशासन को उनका तत्काल पालन करना होगा. अदालत ने कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को निर्देश दिया कि वे सेवा में कार्यरत न्यायिक अधिकारियों के साथ-साथ अच्छी छवि वाले सेवानिवृत्त जिला एवं अतिरिक्त जिला जज का चयन करें. ये अधिकारी ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी में आने वाले मतदाताओं से जुड़े दावों और दस्तावेजों की जांच करेंगे. सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग और राज्य सरकार के बीच पुनरीक्षण प्रक्रिया में देरी को लेकर तीखी बहस हुई. आयोग ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने आवश्यक अधिकारियों की तैनाती नहीं की, जबकि राज्य सरकार की ओर से आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए.
पश्चिम बंगाल DGP तलब
चुनाव आयोग की शिकायतों पर कार्रवाई न करने को लेकर अदालत ने राज्य पुलिस की भूमिका पर भी गंभीर चिंता जताई. अदालत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह बताने का निर्देश दिया कि आयोग की शिकायतों और पुनरीक्षण प्रक्रिया को बाधित करने वाली घटनाओं पर क्या कार्रवाई की गई. बेंच ने कहा कि राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच आरोप-प्रत्यारोप और अविश्वास के कारण पूरी प्रक्रिया बाधित हो गई है, जिससे अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा. न्यायिक अधिकारियों की तैनाती से अदालतों के नियमित कामकाज पर कुछ समय के लिए असर पड़ सकता है. इसे देखते हुए अदालत ने मुख्य न्यायाधीश से आवश्यक मामलों को अन्य अदालतों में ट्रांसफर करने की व्यवस्था करने को कहा है. मामले की अगली सुनवाई मार्च के पहले सप्ताह में होगी.
About the Author
बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें


