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Mukul Roy Death News: पश्चिम बंगाल के पूर्व रेल मंत्री और वरिष्ठ राजनेता मुकुल रॉय का सोमवार सुबह कोलकाता के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनके परिवार ने इसकी पुष्टि की है. वे 73 वर्ष के थे।. मुकुल रॉय का रविवार-सोमवार की मध्यरात्रि 1:30 बजे के कुछ देर बाद निधन हो गया. उनके बेटे सुभ्रांशु रॉय ने इसकी पुष्टि की है. उनके करीबी सहयोगियों के अनुसार, वे कई स्वास्थ्य समस्याओं के कारण काफी समय से इलाज करा रहे थे, लेकिन इलाज का उन पर कोई असर नहीं पड़ रहा था.
मुकुल रॉय 2021 के चुनावों में भाजपा के टिकट पर चुने जाने के बाद टीएमसी में शामिल हो गए थे. (फाइल फोटो)
पश्चिम बंगाल चुनाव में 2011 के चुनाव में तृणमूल की ऐतिहासिक जीत के साथ जब वाम दलों का लगातार 34 साल का शासन समाप्त हुआ, तो रॉय के नेतृत्व में दलबदल की अप्रत्याशित राजनीतिक लहर भी चली. विपक्ष के नियंत्रण वाली नगरपालिकाएं और जिला परिषदों में रातों-रात सत्ता परिवर्तन होता दिखा. कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के कई नेताओं ने सत्ता के नए केंद्र को भांपते हुए सत्तारूढ़ पार्टी की ओर रुख किया. इससे पहले तक पश्चिम बंगाल अपनी वैचारिक ‘स्थिरता’ पर गर्व करता था और दलबदल को अन्य राज्यों की बुराई बताकर खारिज किया जाता था लेकिन रॉय के दौर में दलबदल एक पद्धति की तरह बन गया.
- मुकुल रॉय की इसी रणनीतिक क्षमता के कारण उन्हें ‘पश्चिम बंगाल की राजनीति का चाणक्य’ कहा जाने लगा. कुछ लोगों के लिए वह वैचारिक लचीलेपन के दौर में ‘निर्मम व्यावहारिकता’ के प्रतीक थे, तो कुछ के लिए ‘अवसरवाद’ का पर्याय थे लेकिन उनकी संगठनात्मक कुशलता पर शायद ही किसी ने सवाल उठाया हो.
- साल 2014 के राज्यसभा चुनाव और उसके बाद के स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान रॉय की पर्दे के पीछे की रणनीतियां तृणमूल के विस्तार का अभिन्न अंग बन गईं. पार्टी की संगठनात्मक शक्ति पर उनकी छाप स्पष्ट थी.
- हालांकि, उनके कार्यों पर विवादों का साया भी पड़ा. उनका नाम सारदा चिट फंड मामले और नारद स्टिंग ऑपरेशन में सामने आया. वह इन आरोपों को लगातार नकारते रहे. साथ ही, तृणमूल के भीतर समीकरण भी बदल गए और सत्ता का केंद्रीकरण बनर्जी के इर्द-गिर्द और अधिक बढ़ गया.
- वह 2015 तक तृणमूल के महासचिव के रूप में पार्टी में दूसरे नंबर पर माने जाते थे लेकिन पार्टी से मतभेदों के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया.
- बनर्जी के साथ उनके रिश्ते 2017 तक और खराब हो गए. उन्होंने उस पार्टी को छोड़ दिया जिसे बनाने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी और वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए. तृणमूल के विस्तार के शिल्पकार उसके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल में शामिल हो गए.
- रॉय ने भाजपा में भी अपनी सुनियोजित रणनीति से पार्टी की मदद की. वह 2019 के लोकसभा चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रमुख समन्वयक के रूप में उभरे.
- उनके पीछे तृणमूल के कई और नेताओं ने दल बदला. पार्टी नेताओं ने दावा किया कि 2019 में पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीट में से 18 सीट जीतने में रॉय की नेताओं को शामिल करने की मुहिम की अहम भूमिका रही. उन्हें 2020 में भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया.
- रॉय 2021 में भाजपा के टिकट पर कृष्णानगर उत्तर से विधायक चुने गए थे लेकिन विधानसभा चुनाव परिणामों के कुछ ही हफ्तों के भीतर वह तृणमूल में वापस लौट आए और इसे अपना ‘‘पहला और आखिरी घर’’ बताया. उस समय ममता बनर्जी ने लगातार तीसरी बार निर्णायक जीत हासिल की थी.
- वह तृणमूल कांग्रेस में दोबारा शामिल तो हो गए थे लेकिन उन्हें वह राजनीतिक दबदबा कभी वापस नहीं मिला जो उन्हें कभी प्राप्त था. स्वास्थ्य बिगड़ने के साथ ही वह धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूर होते चले गए. रॉय का स्वास्थ्य 2021 में तेजी से खराब होता चला गया और उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से लोकसभा की लोक लेखा समिति (पीएसी) के अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया था.
- कलकत्ता उच्च न्यायालय ने दलबदल विरोधी कानून के तहत उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया. बाद में उच्चतम न्यायालय ने इस फैसले पर रोक लगा दी. विडंबना यह है कि जिस कानून से वह लंबे समय से बचकर निकलते रहे थे और आलोचकों के अनुसार, अपने करियर के चरम में जिसका उन्होंने हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था, वही अब उन्हीं पर भारी पड़ गया.
- उन्हें मंच के बजाय एकांत, शोरगुल के बजाय बातचीत और नारों के बजाय आंकड़े अधिक पसंद थे. वह शायद ही कभी किसी आंदोलन का चेहरा बने हों, लेकिन अक्सर उसके सूत्रधार रहे.
- रॉय का जीवन पश्चिम बंगाल में 2011 के बाद की राजनीतिक उथल-पुथल को दर्शाता है, जिसमें कठोर वैचारिक रेखाओं का धुंधला होना, दलबदल और भावनाओं पर अस्तित्व की प्रधानता जैसी चीजें शामिल रहीं.
- रॉय के निधन के साथ ही पश्चिम बंगाल के राजनीतिक रंगमंच ने पर्दे के पीछे के उस दक्ष निर्देशक को खो दिया जो सत्ता में मंच से अधिक पर्दे के पीछे सक्रिय रहा और बदलावों की पटकथा को वहीं से अंजाम देकर चुपचाप बाहर निकल गया.
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