नई दिल्ली. 2014 में सत्ता में आने के बाद लगातार ‘नरेंद्र मोदी’ सरकार देश में मौजूद हर गुलामी की कड़ी को खत्म कर रही है. अब इसी कड़ी में दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में मौजूद लुटियंस की प्रतिमा है. प्रधानमंत्री मोदी ने इस महीने अपने मन की बात में इसका जिक्र किया. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति भवन में स्थापित ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की प्रतिमा को स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय गवर्नर-जनरल सी राजगोपालाचारी की प्रतिमा से प्रतिस्थापित किया जाएगा.
ये मूर्ति लगभग 79 वर्षों तक राष्ट्रपति भवन में स्थापित रही. इसके नीचे शिलालेख पर अंकित था- ‘Edwin Lutyens, Architect of this House यानी कि भारत के राष्ट्रपति भवन के निर्माता, जो आजादी से पूर्व गवर्नर हाउस हुआ करता था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ की 131वें संस्करण में इसकी घोषणा की. अब इसे हटाया जा रहा है. यह प्रतिमा अप्रैल 1947 में लगाई गई थी. लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के वायसराय का पदभार संभालने के तुरंत बाद, 12 फरवरी 1947 को, वायसराय हाउस (अब राष्ट्रपति भवन) में लुटियंस की धड़ प्रतिमा स्थापित करने का आदेश दिया था. राष्ट्रपति भवन के स्टाफ क्वार्टर में लंबे समय तक रहे भारतीय महिला फुटबॉल टीम के कोच अनादि बरूआ कहते हैं कि लुटियन की मूरत को वे अपने बचपन से देख रहे थे.
लुटियंस दिल्ली कब तक रहे
एडविन लुटियंस 1912 में दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने के फैसले के बाद यहां पहुंचे थे और 1930 तक रहे. उनकी देखरेख में राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, साउथ ब्लॉक, नॉर्थ ब्लॉक जैसी भव्य इमारतें, सड़कें और उद्यान विकसित हुए. दिलचस्प बात यह है कि लुटियंस दिल्ली छोड़ने के कई वर्ष बाद उनकी प्रतिमा यहां लगाई गई थी.
राष्ट्रपति भवन से हटाई जाएगी लुटियंस की प्रतिमा.
औपनिवेशिक अवशेषों को विदाई
पीएम मोदी की घोषणा के बाद अब 23 फरवरी को ‘राजाजी उत्सव’ मनाया जाएगा. इस अवसर पर राष्ट्रपति भवन के सेंट्रल कोर्टयार्ड में सी. राजगोपालाचारी की मूर्ति स्थापित की जा रही है. साथ ही 24 फरवरी से 1 मार्च तक उनके जीवन पर एक प्रदर्शनी भी लगेगी. यह कदम औपनिवेशिक अवशेषों को हटाने यानी ‘डेकोलोनाइजेशन’ की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जा रहा है.
लुटियंस और राजाजी का एक ही बंगला
अजीब संयोग है कि लुटियंस 1917 के आसपास 10 हेस्टिंग्स रोड (जिसे अब राजाजी मार्ग के नाम से जाना जाता है) के एक बंगले में शिफ्ट हो गए थे. इसी बंगले में स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी भी रहे. इसलिए इस सड़क का नाम राजाजी मार्ग रखा गया. यह दो मंजिला बंगला है, जिसमें आठ बेडरूम हैं. बाद में पूर्व यह राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और प्रणब मुखर्जी का भी निवास रह चुका है.
अब कहां जाएगी लुटियन की मूरत
अब कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति भवन से हटाई जा रही एडविन लुटियन की मूरत को दिल्ली के कोरोनेशन पार्क में रख दिया जाएगा. कोरोनेशन पार्क उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी रोड के पास स्थित है. यह 52 एकड़ में फैला हुआ पार्क ब्रिटिश राज के दौरान आयोजित दिल्ली दरबारों का प्रमुख स्थल रहा है. आज यह पार्क ब्रिटिश साम्राज्यवाद की स्मृतियों का एक प्रकार का ‘कब्रिस्तान’ बन चुका है, जहां राजाओं और वायसरायों की मूर्तियां रखी गई हैं.
किंग जॉर्ज भी यहीं मौजूद
कोरोनेशन पार्क में आपको यहां किंग जॉर्ज V की ऊंची सी संगमरमर की मूर्ति रखी मिलेगी. ये इंडिया गेट के पास उसी जगह लगी थी, जहां पर अब नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगाई गई है. किंग जॉर्ज V के चारों ओर अर्धचंद्राकार में अन्य मूर्तियां हैं जो इस प्रकार हैं-
- लॉर्ड हार्डिंग (वायसराय, 1910-1916) की मूर्ति शामिल है, जिनके कार्यकाल में दिल्ली को राजधानी बनाया गया.
- लॉर्ड चेल्म्सफोर्ड (वायसराय, 1916-1921) की मूर्ति भी यहां है. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत के योगदान से जुड़े हैं.
- लॉर्ड विलिंगडन (वायसराय, 1931-1936) की मूर्ति उनके शासनकाल की याद दिलाती है, जब गांधीजी के आंदोलन जोरों पर थे.
- लॉर्ड हैलिफ़ैक्स उर्फ लॉर्ड इरविन (वायसराय, 1926-1931) की मूर्ति गांधी-इरविन समझौते से जुड़ी है.
- सर गाय डगलस आर्थर फ्लीटवुड विल्सन (पंजाब के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर) की मूर्ति प्रशासनिक सुधारों की प्रतीक है.
- सर जॉन लुईस जेनकिन्स की भी एक मूर्ति मौजूद है. 1911 में ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ इंडिया का नाइट कमांडर (KCSI) बनाया गया था.
दिल्ली में एकमात्र औपनिवेशिक प्रतिमा
खैर, लुटियंस की मूर्ति हटने के बाद भी दिल्ली में एक गोरी महिला की प्रतिमा बनी हुई है. अगर आप कनॉट प्लेस के पास, शहीद भगत सिंह मार्ग पर स्थित लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के मुख्य द्वार के अंदर जाएं, तो एक आदमकद महिला की मूर्ति दिखाई देगी. यह विदेशी महिला की प्रतिमा है, जो मानो हर गुजरने वाले को निहार रही हो. यह लेडी हार्डिंग की मूर्ति है.
महिलाओं के योगदान
लेडी हार्डिंग ने महिलाओं के लिए मेडिकल शिक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया. उनकी प्रेरणा और प्रयासों से 7 फरवरी 1916 को यह मेडिकल कॉलेज शुरू हुआ. उन्होंने 17 मार्च 1914 को इसकी नींव रखी थी. दुर्भाग्य से, उसी वर्ष उनकी मृत्यु हो गई और क्वीन मैरी की सलाह पर संस्थान का
नाम लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज रखा गया. यह भारत का महिलाओं के लिए सबसे पुराना मेडिकल कॉलेज है.
कोलकाता से दिल्ली राजधानी लाई गई
लेडी हार्डिंग के पति लॉर्ड हार्डिंग के प्रति दिल्लीवासी कृतज्ञता व्यक्त कर सकते हैं, क्योंकि उनकी सिफारिश पर भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित हुई. लॉर्ड हार्डिंग ने 25 अगस्त 1911 को शिमला से ब्रिटिश सरकार को भेजे एक पत्र में लिखा था, ‘ब्रिटेन के लिए कलकत्ता की तुलना में दिल्ली को राजधानी बनाकर शासन करना बेहतर विकल्प होगा.’
कब स्थापित हुई प्रतिमा
लेडी हार्डिंग की यह प्रतिमा कब स्थापित हुई, इसकी पक्की जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन अनुमान है कि कॉलेज की स्थापना के आसपास ही लगाई गई होगी. लेडी हार्डिंग की इस मूरत को यह लेखक बीते पचास सालों से देख रहे हैं. यहां की छात्राएं, अध्यापक और कर्मचारी इन्हें प्यार से ‘माताजी’ कहकर पुकारते हैं.
लेडी हार्डिंग की प्रतिमा आज भी दिल्ली के मेडिकल कॉलेज में मौजूद.
क्या कहते हैं इतिहासकार
दिल्ली यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के एचओडी डॉ. अनिरुद देशपांडे कहते हैं कि लेडी हार्डिंग ने इस कॉलेज की स्थापना के लिए राजा-महाराजाओं से धन संग्रह किया था. इस प्रकार, दिल्ली में औपनिवेशिक प्रतीकों को हटाने की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन लेडी हार्डिंग की मूर्ति महिलाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके योगदान के कारण एक अपवाद बनी हुई है. यह मूर्ति न केवल इतिहास की गवाह है, बल्कि आज भी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है.


