क्या जमीन पर पलथी मारकर खाना कुर्सी मेज पर बैठकर खाने से बेहतर होता है

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क्या जमीन पर पलथी मारकर खाना कुर्सी – मेज पर बैठकर खाने से बेहतर होता है

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भारत में 70-80 के दशक तक ज्यादातर लोग जमीन पर बिछे आसन या लकड़ी के पात्र पर पलथी बैठकर ही खाना खाते थे. इसके बाद अब ज्यादातर घरों में कुर्सी मेज पर बैठकर खाने का चलन बढ़ गया. लेकिन अब फिर से ये कहा जाने लगा है कि क्या जमीन पर पलथी मारकर भोजन करना बेहतर है. साइंस इस पर क्या कहती है. क्यों भारतीय तरीके को बेहतर माना जा रहा है.

ज़मीन पर बैठकर खाना सिर्फ एक पुरानी भारतीय परंपरा नहीं है, बल्कि इसके पीछे विज्ञान भी खड़ा है. जब आप ज़मीन पर पालथी मारकर सुखासन में बैठते हैं, तो आपका शरीर खाना पचाने के लिए खुद को तैयार कर लेता है. सुखासन पोजीशन पेट की मांसपेशियों को सक्रिय करती है, जिससे भोजन जल्दी पचता है और पोषक तत्व बेहतर अवशोषित होते हैं. यह चयापचय को बढ़ावा देता है तथा ओवरईटिंग रोकता है.

इस स्थिति में बैठने से आपको खाना लेने के लिए आगे झुकना होता है. वापस सीधा होना होता है. इस बार-बार की क्रिया से पेट की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं, जिससे पेट में गैस्ट्रिक जूस (पाचक रस) का स्राव बढ़ता है और खाना जल्दी पचता है. कुर्सी पर बैठकर खासकर अगर आप झुककर बैठते हैं, तो पेट पर दबाव पड़ सकता है, जिससे एसिड रिफ्लक्स और अपच की समस्या हो सकती है.

ज़मीन पर बैठने पर गुरुत्वाकर्षण भोजन को पचाने में मदद करता है. एक अध्ययन में पाया गया कि सीधे बैठने की स्थिति में, लेटने की तुलना में, पेट का निचला हिस्सा भोजन को अधिक समय तक रोके रखता है, जिससे पाचन क्रिया बेहतर तरीके से हो पाती है और भूख भी कम लगती है.

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पालथी मारकर बैठने पर रीढ़ की हड्डी खुद ही सीधी हो जाती है, जिससे पीठ दर्द की समस्या नहीं होती. शरीर लचीला बनता है. कुर्सी पर अक्सर हम झुककर बैठ जाते हैं, जिससे रीढ़ पर गलत दबाव पड़ता है. सुखासन से पैरों की नसों पर दबाव बनता है, जिससे रक्त संचार बेहतर होता है और हृदय को रक्त पंप करने में कम मेहनत लगती है.

जब हम कुर्सी पर बैठते हैं, तो हमारे पैर की मांसपेशियां पूरी तरह निष्क्रिय हो जाती हैं. वहीं ज़मीन पर पालथी मारकर बैठने पर भले ही हम आराम कर रहे हों, हमारी टांगों की मांसपेशियां सक्रिय बनी रहती हैं. शोध बताते हैं कि इस तरह बैठने से मांसपेशियां उतनी ही सक्रिय रहती हैं, जितनी कि टहलने के दौरान होती हैं.

सुखासन ध्यान लगाने की मुद्रा है. इस स्थिति में खाने से मन शांत रहता है और तनाव कम होता है. जब आप इस मुद्रा में बैठते हैं, तो आपका ध्यान अपने शरीर और भोजन पर केंद्रित होता है. आप धीरे-धीरे खाते हैं, भोजन का स्वाद लेते हैं. जल्दी-जल्दी खाने से बचते हैं. यह “माइंडफुल ईटिंग” कहलाता है, जिससे पेट भरे होने का संकेत दिमाग को समय पर मिल जाता है. आप जरूरत से ज्यादा खाने से बच जाते हैं.

अब विज्ञान का पक्ष भी जान लेते हैं. साइंस के कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि जमीन पर बैठकर भोजन करने की पोजीशन वेजस नर्व यानि पेट और दिमाग को जोड़ने वाली नर्व को बेहतर तरीके से सक्रिय करती है, जो पाचन को नियंत्रित करती है. रिसर्च से पता चलता है कि माइंडफुल ईटिंग से ओबेसिटी का रिस्क कम होता है. फ्लोर सिटिंग इस प्रक्रिया को प्रोत्साहित करती है. एक स्टडी में पाया गया कि फ्लोर सिटिंग जोड़ों को मजबूत बनाती है, सर्कुलेशन बेहतर करती है और जॉइंट मोबिलिटी बढ़ाती है.

कुल मिलाकर अगर आप फिट हैं, तो जमीन पर बैठकर खाना एक हेल्दी आदत हो सकती है – यह न सिर्फ शरीर को मजबूत बनाती है, बल्कि खाने का अनुभव भी ज्यादा संतोषजनक बनाती है.वैसे आपको बता दें कि जमीन पर क्रॉस लेग्ड बैठकर खाना खाने की परंपरा केवल भारत में नहीं है बल्कि कई देशों और संस्कृतियों में भी सदियों से प्रचलित रही है, खासकर एशिया, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में.

जापान में पारंपरिक रूप से तातामी मैट पर बैठकर कम ऊंचाई वाली टेबल पर खाना लगाकर खाया जाता है. लोग घुटनों के बल या पलथी लगाकर बैठते हैं. दक्षिण कोरिया में “फ्लोर कल्चर” बहुत मजबूत है. लोग गर्म फर्श पर बैठकर खाते ही नहीं बल्कि टीवी देखते हैं, सोते हैं. वियतनाम में भी ग्रामीण इलाकों में परिवार चटाई पर फर्श पर बैठकर साथ खाता है. मिडिल ईस्ट यानि अरब देशों जैसे सऊदी अरब, यूएई, मोरक्को आदि में लोग फर्श पर चटाई या दरी बिछाकर बैठते हैं, हाथ से खाते हैं. अफ्रीका के कुछ हिस्सों में भी खाना खाने का यही तरीका इस्तेमाल होता है.

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