Juhi Jha achieved success in education despite disability in Purvi Champaran cycle wali didi juhi jha inspiring story

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Inspirational story: कहते हैं हौसले बुलंद हों तो शारीरिक अक्षमता भी बेड़ियां नहीं बन पातीं. पूर्वी चंपारण की जूही झा ने इसे सच कर दिखाया है. जन्म के एक साल बाद ही पैरालाइज्ड होने के बावजूद, जूही ने भाई की साइकिल और फिर व्हीलचेयर के सहारे स्नातक तक की पढ़ाई पूरी की. आज वह न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि सैकड़ों अनपढ़ महिलाओं और गरीब बच्चों को शिक्षित कर समाज की मुख्यधारा से जोड़ रही हैं. तत्कालीन डीएम द्वारा सम्मानित जूही की यह कहानी संघर्ष, स्वावलंबन और नारी शक्ति की एक अनोखी मिसाल है.

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आदित्य गौरव/पूर्वी चंपारणः बिहार के पूर्वी चंपारण जिले में एक ऐसी सुपरवुमन की चर्चा है, जिसने अपनी शारीरिक अक्षमता को कभी अपने सपनों की बेड़ी नहीं बनने दिया. यह कहानी है सुगौली प्रखंड के छड़गाहां गांव की रहने वाली जूही झा की. जूही ने न केवल अपनी दिव्यांगता को हराया, बल्कि अपनी इच्छाशक्ति से जिले की सैकड़ों अनपढ़ महिलाओं के जीवन में शिक्षा का उजियारा फैलाया है.

भाई की साइकिल से व्हीलचेयर तक का सफर
जूही का संघर्ष तब शुरू हुआ जब जन्म के महज एक साल बाद ही वह पैरालाइज्ड हो गईं. बचपन में जब हमउम्र बच्चों को दौड़ते-भागते देखतीं, तो उनके मन में भी कुछ कर गुजरने की तड़प जागती. पढ़ाई की जिद ऐसी थी कि शुरुआत में वे अपने भाई की साइकिल पर पीछे बैठकर स्कूल जाने लगीं. कक्षा आठ में पहुंचते-पहुंचते उन्हें व्हीलचेयर नसीब हुई. जिसके बाद जूही ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने न सिर्फ स्नातक की शिक्षा पूरी की, बल्कि मनोविज्ञान में उच्च शिक्षा के साथ-साथ ADCA और टैली जैसे तकनीकी कोर्स भी किए.

अनपढ़ महिलाओं के लिए बनीं ‘मसीहा’
जूही का मानना है कि एक शिक्षित मां ही शिक्षित समाज की नींव है. इसी मंत्र के साथ उन्होंने अब तक सैकड़ों अनपढ़ महिलाओं को साक्षर बनाया है. उनकी इस सामाजिक क्रांति को देखते हुए साल 2008 में जिले के तत्कालीन जिलाधिकारी नर्मदेश्वर लाल ने उन्हें सम्मानित किया. वहीं 2016 में उनकी सेवाओं के लिए एक निजी संस्थान ने उन्हें 25,000 रुपये की सम्मान राशि देकर नवाजा.

गरीब बच्चों की ‘ट्यूशन वाली मैडम’
आज जूही न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि घर के सारे काम जैसे खाना बनाना और कपड़े धोना खुद ही करती हैं. उन्होंने खुद गरीबी झेली है, इसलिए आज वह अपने आसपास के गरीब बच्चों को मामूली फीस पर ट्यूशन पढ़ाती हैं, ताकि शिक्षा की लौ बुझने न पाए. जूही झा की यह कहानी समाज के लिए संदेश है कि शरीर अक्षम हो सकता है, हौसला नहीं. आज पूरा जिला उनकी इस व्हीलचेयर वाली क्रांति को सलाम कर रहा है.

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Amit ranjan

मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें



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