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सहरसा जिले की जिला कला संस्कृति पदाधिकारी स्नेहा कुमारी पारंपरिक बांस शिल्प को नई पहचान देने में जुटी हैं. उनके हाथों में ऐसा कौशल है कि साधारण कच्चे बांस से आकर्षक और उपयोगी उत्पाद तैयार हो जाते हैं. वह सजावटी मूर्तियां, पारंपरिक खिलौने, टोकरी, डलिया और घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाकर बच्चों को भी सिखाती हैं. अक्सर वह बच्चों के साथ जमीन पर बैठकर बांस की पतली पट्टियों को चीरना, मोड़ना और बुनना सिखाती हैं. वह बताती हैं कि यह केवल शिल्प नहीं, हमारी सांस्कृतिक पहचान है, जो गांवों के जीवन का अहम हिस्सा रही है.
सहरसा जिले की जिला कला संस्कृति पदाधिकारी स्नेहा कुमारी पारंपरिक शिल्प को नई पहचान देने में जुटी हैं उनके हाथों में बांस का ऐसा हुनर है कि साधारण कच्चे बांस से वह आकर्षक और उपयोगी उत्पाद तैयार कर देती हैं. सजावटी मूर्तियां, पारंपरिक खिलौने, टोकरी, डलिया, उपहार सामग्री और घरेलू उपयोग की कई वस्तुएं वह खुद बनाती हैं और बच्चों को भी सिखाती हैं.
अक्सर देखा जाता है कि स्नेहा कुमारी बच्चों के बीच जमीन पर बैठकर बांस की पतली-पतली पट्टियों को चीरती, मोड़ती और बुनती हैं बच्चे उत्साह से उन्हें देखते हैं और फिर उनके साथ-साथ टोकरी या छोटी डलिया बनाना सीखते हैं. वह बच्चों को समझाती हैं कि यह सिर्फ शिल्प नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान है. गांव-कस्बों में वर्षों से बांस की बनी चीजें रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा रही हैं जैसे अनाज रखने की डलिया, फल-सब्जी की टोकरी, पूजा की सामग्री रखने की सूप-डाल, खिलौने और सजावट की वस्तुएं.
हर हुनर की होती है गरिमा
स्नेहा कुमारी का मानना है कि आधुनिकता के दौर में बच्चे पारंपरिक वस्तुओं से दूर होते जा रहे हैं इसलिए वह उन्हें हाथों से काम करने, प्राकृतिक संसाधनों को पहचानने और स्थानीय परंपराओं को समझने के लिए प्रेरित करती हैं जब बच्चे खुद बांस को छूते, काटते और बुनते हैं तो उन्हें श्रम, धैर्य और सृजन का महत्व समझ आता है इससे उनकी रचनात्मकता भी बढ़ती है और आत्मविश्वास भी. वह बच्चों से कहती हैं कि हर हुनर की अपनी गरिमा होती है. बांस शिल्प भी एक कला है, जिसे सीखकर भविष्य में स्वरोजगार के अवसर बनाए जा सकते हैं. सहरसा और आसपास के क्षेत्रों में बांस आसानी से उपलब्ध है इसलिए इससे बने उत्पाद बाजार में भी बिक सकते हैं इस तरह पारंपरिक कला आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम बन सकती है.
अभिभावक भी रहते हैं खुश
उनकी पहल से स्कूलों और गांवों के बच्चों में खास उत्साह देखा जा रहा है. कई बच्चे अब घर पर भी छोटे-छोटे बांस उत्पाद बनाने लगे हैं. अभिभावक भी खुश हैं कि बच्चे मोबाइल-टीवी से हटकर कुछ रचनात्मक सीख रहे हैं. वह मानती हैं कि संस्कृति किताबों से नहीं, अनुभव से जीवित रहती है जब बच्चे अपने हाथों से परंपरा को गढ़ते हैं तभी वह पीढ़ियों तक सुरक्षित रहती है.
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