Success Story: बिहार के एक छोटे से कस्बे में पले-बढ़े अरुणाभ सिन्हा की कहानी किसी किताब के पन्नों से नहीं, बल्कि हकीकत की जमीन से निकली है. यह सिर्फ एक स्टार्टअप की सक्सेस स्टोरी नहीं, बल्कि उस मां के कंगनों की चमक की कहानी है, जो बेटे के सपनों के लिए कुर्बान हो गई; उस संघर्ष की कहानी है, जिसने असफलता को सीढ़ी बनाया और हार मानने से इनकार कर दिया. अरुणाभ का सफर यह सिखाता है कि बड़ी कामयाबी हमेशा किसी बड़े आइडिया से नहीं आती, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-सी समस्या को नए नजरिए से देखने और उसे हल करने की हिम्मत से जन्म लेती है.
बचपन से ही अरुणाभ पढ़ाई में तेज थे, लेकिन घर की आर्थिक हालत उनके सपनों के रास्ते में अक्सर दीवार बनकर खड़ी हो जाती थी. पिता की सीमित कमाई से घर जैसे-तैसे चलता था. ऐसे वक्त में मां का भरोसा ही उनकी सबसे बड़ी ताकत था. जब अरुणाभ का चयन आईआईटी में हुआ, तो घर में खुशी के साथ चिंता भी आ गई इतनी बड़ी फीस कैसे जुटेगी? तब मां ने बिना एक पल सोचे अपने कंगन बेच दिए, ताकि बेटे का भविष्य अधूरा न रह जाए. उस दिन अरुणाभ ने सिर्फ आईआईटी में दाखिला नहीं लिया, बल्कि अपने कंधों पर मां के सपनों और त्याग की जिम्मेदारी भी उठा ली. यही एहसास आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया.
जॉब छोड़कर उठाया बड़ा कदम
अरुणाभ ने आईआईटी बॉम्बे से मेटलर्जी और मटेरियल साइंस में पढ़ाई पूरी की. पढ़ाई खत्म होते ही उन्हें विदेश में शानदार नौकरी मिल गई, जहां सालाना पैकेज करीब 84 लाख रुपये था. ज्यादातर लोग इसे जीवन की सबसे बड़ी कामयाबी मानते हैं, लेकिन अरुणाभ के लिए यह मंजिल नहीं थी. उनके मन में हमेशा कुछ अपना करने की इच्छा थी. उन्हें लगने लगा कि सिर्फ नौकरी करना उनके सपनों को पूरा नहीं कर पाएगा.
लॉन्ड्री इंडस्ट्री में किया स्टार्टअप शुरू
उन्होंने नौकरी छोड़कर पहला स्टार्टअप फ्रेंग्लोबल शुरू किया, लेकिन यह सफल नहीं हो सका. यह दौर उनके लिए बेहद कठिन था. उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा, आत्मविश्वास भी डगमगाया, लेकिन अरुणाभ ने हार नहीं मानी. इसी असफलता के बीच उन्होंने भारत की एक आम लेकिन अनदेखी समस्या पर ध्यान दिया जोकि लॉन्ड्री और ड्राई क्लीनिंग सेक्टर में था. देश में यह काम पूरी तरह असंगठित था. लोग अब भी पारंपरिक धोबी पर निर्भर थे, जहां न तो समय की गारंटी थी और न ही क्वालिटी की.
यहीं से एक नए आइडिया ने जन्म लिया. साल 2016 में अरुणाभ ने महज 20 लाख रुपये की पूंजी से यूक्लीन (UClean) की शुरुआत की. पहला आउटलेट दिल्ली के वसंत कुंज में खोला गया. शुरुआत बेहद चुनौतीपूर्ण रही. परिवार और दोस्त भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे. कई लोग तंज कसते थे कि आईआईटी से पढ़ा लड़का कपड़े धोने का बिजनेस क्यों कर रहा है. लेकिन अरुणाभ और उनकी पत्नी गुंजन तनेजा ने आलोचनाओं पर ध्यान देने के बजाय काम पर फोकस किया.
UClean का काम
यूक्लीन की सबसे बड़ी ताकत इसका टेक्नोलॉजी-आधारित मॉडल बना. ग्राहकों को ऐप, वेबसाइट और व्हाट्सएप के जरिए कपड़े पिकअप का समय चुनने की सुविधा दी गई. कपड़ों पर बारकोड लगाया जाता है, जिससे पूरा प्रोसेस ट्रैक किया जा सके. 24 से 48 घंटे के भीतर कपड़े धुलकर, प्रेस होकर वापस घर पहुंच जाते हैं. वॉश एंड आयरन, ड्राई क्लीन और स्पेशल केयर जैसे विकल्प, पहले से तय कीमतें, कोई छिपा चार्ज नहीं और डिजिटल पेमेंट—इन सबने ग्राहकों का भरोसा जीता.
कंपनी ने फ्रेंचाइजी मॉडल अपनाया, जिससे छोटे निवेशक भी अपने इलाके में यूक्लीन का आउटलेट खोल सकें. यही रणनीति यूक्लीन की तेज रफ्तार ग्रोथ की वजह बनी. कुछ ही सालों में कंपनी ने देशभर में अपनी पहचान बना ली.
सालाना टर्नओवर 160 करोड़ रुपये से ज्यादा
आज यूक्लीन भारत की सबसे बड़ी लॉन्ड्री चेन बन चुकी है. कंपनी के 800 से ज्यादा आउटलेट भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, घाना, सोमालिया और मॉरीशस जैसे देशों में भी संचालित हो रहे हैं. हाल ही में यूएई में भी यूक्लीन ने एंट्री की है. कंपनी का लक्ष्य अगले 18 महीनों में 1000 से ज्यादा आउटलेट खोलने का है. मौजूदा समय में यूक्लीन का सालाना टर्नओवर 160 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है और हर साल लाखों ग्राहक इसकी सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं.
अरुणाभ सिन्हा की कहानी इस बात का सबूत है कि सफलता सिर्फ बड़े सपनों से नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े विचारों से मिलती है. मां का त्याग, पहली नाकामी से मिली सीख और लगातार मेहनत ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया. आज भी अरुणाभ अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं और मानते हैं कि भारत जैसे देश में छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान में ही बड़े बिजनेस छिपे हैं. युवाओं के लिए यह कहानी एक साफ संदेश देती है कि अगर सोच सही हो और मेहनत सच्ची हो, तो कपड़े धोने जैसा साधारण काम भी करोड़ों का ब्रांड बन सकता है.


