अक्सर नसों से जुड़ी बीमारियां बुजुर्गों में देखी जाती रही हैं. लेकिन लगातार लेपटॉप या डेस्कटॉप के सामने बैठकर काम करने वाले 20 और 30 साल के युवा भी अब नसों से जुड़ी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं. वैरिकोज वेन्स, वेनस रिफ्लक्स और डीप वेन थ्रोम्बोसिस (DVT) जैसी गंभीर बीमारियाँ अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही हैं. हालिया रिपोर्टों के अनुसार, पिछले कुछ सालों में 25 से 45 वर्ष के पुरुषों में इन बीमारियों में लगभग 30% की वृद्धि हुई है. घंटों तक एक ही जगह बैठकर काम करना और शहरी जीवन का तनाव अब युवाओं की नसों को ‘बूढ़ा’ बना रहा है.
क्या है यह नसों की बीमारी?
हमारी नसें (Veins) शरीर में एक महत्वपूर्ण पंप का काम करती हैं. धमनियां दिल से ऑक्सीजन युक्त खून पूरे शरीर में ले जाती हैं, जबकि नसें उस खून को वापस दिल तक पहुँचाती हैं. पैरों में यह काम गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ होता है. इसके लिए नसों में ‘वन-वे वॉल्व’ होते हैं. जब ये वॉल्व कमजोर हो जाते हैं, तो खून वापस दिल तक जाने के बजाय पैरों में जमा होने लगता है, जिससे नसें सूज जाती हैं और मुड़ जाती हैं. सीके बिरला हॉस्पिटल्स के इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विभाग के निदेशक और प्रमुख, डॉ. अविक भट्टाचार्य ने कहा, “नसों की बीमारी में पैरों की नसों से जुड़ी समस्याएँ जैसे क्रॉनिक वेनस इंसफिशिएंसी और वैरिकोज वेन्स शामिल हैं. इसमें पैरों की नसों में खून जमा हो जाता है क्योंकि दबाव बढ़ जाता है. ऐसा तब होता है जब नसों के वाल्व कमजोर हो जाते हैं या खराब हो जाते हैं, जिससे खून उल्टी दिशा में बहने लगता है. इससे नसों में खून ठहर जाता है या नसें फूल जाती हैं.”
खतरे की घंटी: ‘सामान्य थकान’ समझने की भूल न करें
युवा अक्सर पैरों में होने वाले दर्द या भारीपन को ‘दिन भर की थकान’ समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, टखनों के आसपास सूजन, रात में मांसपेशियों में ऐंठन यानी क्रैंप्स आना, पैरों में जलन या नसों का नीला पड़ना, ये सभी वेनस डिजीज के शुरुआती लक्षण हैं. यदि समय पर ध्यान न दिया जाए, तो यह डीप वेन थ्रोम्बोसिस (DVT) का रूप ले सकता है, जिसमें नसों के अंदर खून का थक्का जम जाता है. यह थक्का अगर फेफड़ों तक पहुँच जाए, तो जानलेवा भी हो सकता है.
वेरिकोज वेन्स की समस्या वात दोष के असंतुलन से उत्पन्न होती है.
आईटी और कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल: सबसे बड़ा विलेन
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण हमारी ‘सेडेंटरी लाइफस्टाइल’ (बैठकर काम करने वाली शैली) है. आईटी, फाइनेंस और कंसल्टिंग जैसे क्षेत्रों में पेशेवर दिन में 8 से 12 घंटे बैठे रहते हैं. जब पैरों की मांसपेशियां लंबे समय तक सक्रिय नहीं होतीं, तो रक्त संचार धीमा हो जाता है. इसके अलावा, घंटों ट्रैफिक में फंसे रहना, डिहाइड्रेशन, अनियमित नींद और बढ़ता मोटापा इस आग में घी का काम कर रहे हैं.
“युवा लड़के-लड़कियों को हमेशा से नसों की बीमारी होती रही है; बस पहले के समय में इसकी जानकारी कम होने और सही जांच के टेस्ट न होने की वजह से इसे कम उम्र में डायग्नोज नहीं किया जाता था.” – डॉ. अविक भट्टाचार्य, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी हेड, सीके बिरला हॉस्पिटल्स


